मुंबई में IIMUN कार्यक्रम में संघ प्रमुख ने कहा- नई पीढ़ी को देशविरोधी बताना गलत, सरकार और समाज दोनों को युवाओं से लगातार संवाद बनाए रखना चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नई पीढ़ी (Gen-Z) को देश की सबसे ईमानदार और देशभक्त पीढ़ी बताते हुए कहा कि युवाओं के आंदोलनों की बड़ी वजह संवाद का अभाव है। उन्होंने कहा कि सरकार, समाज और संस्थानों को युवाओं की बात गंभीरता से सुननी चाहिए, क्योंकि आंदोलन व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता का संकेत होते हैं।
मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि Gen-Z और Gen-Alpha पीढ़ी देश के प्रति बेहद ईमानदार और प्रतिबद्ध है। उनका मानना है कि युवाओं को केवल निर्देश देने के बजाय उनकी बात सुनना और उनके साथ निरंतर संवाद बनाए रखना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जब संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं, तब आंदोलन जन्म लेते हैं।
मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी हर बात पर सवाल करती है और तर्कसंगत जवाब चाहती है। यह बदलाव सकारात्मक है और समाज को इसे स्वीकार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन को केवल विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यदि युवा अपनी बात को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं तो उसके पीछे कोई न कोई वास्तविक समस्या अवश्य होती है। ऐसे मामलों में सरकार और संबंधित संस्थाओं को पहले संवाद स्थापित कर समाधान खोजने का प्रयास करना चाहिए। उनके अनुसार आंदोलन भी लोकतांत्रिक संवाद की एक प्रक्रिया है।
संघ प्रमुख ने कहा कि युवाओं को देशविरोधी करार देना उचित नहीं है। वे देश की अगली पीढ़ी हैं और राष्ट्र निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। समाज और वरिष्ठ पीढ़ी का दायित्व है कि वे युवाओं की भावनाओं और अपेक्षाओं को समझें तथा उन्हें विश्वास के साथ आगे बढ़ने का अवसर दें।
शिक्षा व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल व्यवसाय का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा सभी तक पहुंचे, इसके लिए सरकार के साथ समाज की भी समान भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बुनियादी ढांचे और अवसरों को मजबूत करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
भागवत ने भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों, महिलाओं की नेतृत्व क्षमता और सामाजिक विषयों पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है, लेकिन संघर्ष की परिस्थितियां समाप्त होने के बाद संवाद के रास्ते हमेशा खुले रहने चाहिए। वहीं महिलाओं की भागीदारी को समाज और राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक बताते हुए उन्हें समान अवसर और अधिकार देने की आवश्यकता पर बल दिया।