धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि अपने भक्तों के भय दूर करने और उन्हें अभय प्रदान करने वाली देवी हैं. उनका स्वरूप भले ही उग्र दिखाई देता है, लेकिन वे अपने भक्तों का कल्याण करती हैं. इसी कारण उन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए भक्त विधि-विधान से पूजा करते हैं. इस दौरान माता को विशेष भोग अर्पित करने का भी महत्व बताया गया है. आइए जानते हैं कि मां कालरात्रि को कौन-कौन सी चीजें भोग के रूप में अर्पित की जा सकती है
नईदिल्ली (ए)। आज यानी 17 अक्टूबर को शारदीय नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही मां कालरात्रि की कृपा प्राप्त करने के लिए व्रत भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, नवरात्रि में सच्चे मन से मां कालरात्रि की पूजा करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और हर प्रकार के भय से छुटकारा मिलता है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में हम आपको मां कालरात्रि की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और कथा आदि के बारे में बताते हैं।
शारदीय नवरात्र के सातवें दिन का शुभ मुहूर्त
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 38 मिनट तक।
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 59 मिनट से सुबह 05 बजकर 47 मिनट तक।
अपराह्न (संध्या) पूजा मुहूर्त: दोपहर 03 बजकर 54 मिनट से शाम 06 बजकर 14 मिनट तक।
मां कालरात्रि की पूजा विधि
इस दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ कपड़े धारण करें।
मां कालरात्रि की प्रतिमा का अभिषेक करें और वस्त्र पहनाएं।
देवी को कुमकुम, लाल चंदन और फूल अर्पित करें।
देसी घी का दीपक जलाएं।
सच्चे मन से देवी की आरती करें।
व्रत कथा का पाठ करें और मंत्रों का जाप करें।
गुड़ की खीर, फल आदि का भोग लगाएं।
देवी से जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति की कामना करें।
अंत में लोगों में प्रसाद वितरण करें और स्वयं भी ग्रहण करें।
मां कालरात्रि के प्रिय भोग
मां कालरात्रि को गुड़ अत्यंत प्रिय है। सातवें दिन उन्हें गुड़ या गुड़ से बनी मिठाइयों का भोग लगाना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन चीजों का भोग लगाने से देवी प्रसन्न होती हैं।
मां कालरात्रि कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था, जिसकी वजह से देवी-देवता परेशान होने लगे। ऐसे में उन्होंने देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की। वहीं, इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए सभी देवता महादेव के पास पहुंचे। तब शिव जी ने माता पार्वती से शुंभ-निशुंभ का अंत करने के लिए कहा। इसके बाद माता पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण किया और उनका वध किया।
जब मां दुर्गा रक्तबीज का वध करने आईं, तो रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि यदि उसके खून की एक बूंद भी जमीन पर गिरी, तो उसके जैसा एक और राक्षस पैदा हो जाएगा। इसी वजह से उसे कोई मार नहीं पा रहा था। इसके बाद मां दुर्गा ने अपने तेज से मां कालरात्रि का रूप धारण किया। मां कालरात्रि ने रक्तबीज के रक्त को जमीन पर गिरने नहीं दिया और उसे अपने मुख में ले लिया। इस प्रकार मां कालरात्रि ने रक्तबीज का संहार किया।
मां कालरात्रि बीज मंत्र
क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:।
मंत्र
1. ज्वाला कराल अति उग्रम शेषा सुर सूदनम।
त्रिशूलम पातु नो भीते भद्रकाली नमोस्तुते।।
2. ओम देवी कालरात्र्यै नमः।