122 जिलों में महिलाओं की मृत्यु का पंजीकरण 40% से भी कम, ग्रामीण क्षेत्रों में हर तीसरी मौत का आंकड़ा सरकारी दस्तावेजों से गायब
नई दिल्ली (ए)। देश में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण की व्यवस्था में गंभीर खामियां सामने आई हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) के आंकड़ों के अनुसार, देश में होने वाली कुल मौतों में से केवल 70.8 प्रतिशत का ही सरकारी रिकॉर्ड तैयार हो पाया। इसका मतलब है कि करीब 30 प्रतिशत मौतें सरकारी आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो सकीं। इस मामले में महिलाओं की स्थिति पुरुषों की तुलना में अधिक चिंताजनक है। पुरुषों की 73 प्रतिशत मौतों का पंजीकरण हुआ, जबकि महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा महज 64 प्रतिशत रहा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, देश के 707 जिलों में से 122 ऐसे हैं, जहां महिलाओं की 40 प्रतिशत से भी कम मौतें दर्ज की गईं। बिहार में स्थिति विशेष रूप से खराब है। यहां के 38 जिलों में से 37 में महिलाओं की मृत्यु पंजीकरण दर 60 प्रतिशत से नीचे रही। झारखंड में भी लगभग ऐसी ही स्थिति देखने को मिली। अरुणाचल प्रदेश के कुरुंग कुमे जिले में महिलाओं की मौतों का महज 5 प्रतिशत रिकॉर्ड ही सरकारी स्तर पर दर्ज हो पाया।
विकास की दौड़ में पिछड़े आकांक्षी जिलों में भी मृत्यु पंजीकरण की स्थिति कमजोर पाई गई है। देश के 112 आकांक्षी जिलों में केवल 54.4 प्रतिशत मौतें ही दर्ज हुईं, जबकि अन्य जिलों में यह दर 73.7 प्रतिशत रही। दोनों के बीच 19.3 प्रतिशत अंकों का अंतर स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए जमीनी स्तर पर प्रयास बढ़ाने होंगे। सिविल रजिस्ट्रेशन एंड वाइटल स्टैटिस्टिक्स (सीआरवीएस) प्रणाली को मजबूत करने के साथ पंचायतों, आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी केंद्रों को इस अभियान से जोड़ना जरूरी है। इनके माध्यम से परिवारों को मृत्यु पंजीकरण की प्रक्रिया समझाने और आवश्यक दस्तावेज तैयार कराने में मदद मिल सकती है।