ढाबे में हुई करोड़ों की डील, तीन दिन में खाली किए गए 92 टन गैस से भरे कैप्सूल; चोरी की गैस खरीदने वालों की तलाश तेज
महासमुंद जिले में जब्त एलपीजी गैस कैप्सूल ट्रकों से करोड़ों रुपए की गैस गायब होने के मामले में पुलिस जांच ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। जांच में जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव को पूरे गैस सिंडिकेट का मास्टरमाइंड बताया गया है। पुलिस के अनुसार योजनाबद्ध तरीके से करीब 92 टन एलपीजी गैस का गबन कर उसे निजी एजेंसियों और प्लांटों तक पहुंचाया गया। मामले में कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जबकि कुछ आरोपी अब भी फरार हैं।
महासमुंद। महासमुंद जिले में सामने आए एलपीजी गैस घोटाले ने प्रशासनिक तंत्र और गैस कारोबार से जुड़े नेटवर्क की मिलीभगत को उजागर कर दिया है। पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि जब्त गैस कैप्सूल ट्रकों से करोड़ों रुपए की एलपीजी गैस सुनियोजित तरीके से निकालकर निजी एजेंसियों को बेची गई। इस पूरे खेल का कथित मास्टरमाइंड जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव को बताया जा रहा है।
पुलिस के मुताबिक, खाद्य अधिकारी ने गौरव गैस एजेंसी संचालक पंकज चंद्राकर, रायपुर निवासी मनीष चौधरी और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर करीब डेढ़ करोड़ रुपए कीमत की 92 टन गैस का गबन किया। मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि संतोष ठाकुर और सार्थक ठाकुर समेत कुछ आरोपी अब भी फरार बताए जा रहे हैं।
जांच में सामने आया कि दिसंबर 2025 में सिंघोड़ा थाना क्षेत्र में 6 एलपीजी कैप्सूल ट्रक जब्त किए गए थे। सुरक्षा कारणों से इन्हें सुरक्षित स्थान पर रखने की जिम्मेदारी खाद्य विभाग को दी गई थी। इसी दौरान गैस चोरी की पूरी साजिश रची गई।
23 मार्च 2026 को आरंग स्थित एक ढाबे में आरोपियों की बैठक हुई, जिसमें गैस निकालने की रणनीति तैयार की गई। इसके बाद 26 मार्च को खाद्य अधिकारी और गैस एजेंसी संचालक ने सिंघोड़ा पहुंचकर ट्रकों में भरी गैस का आंकलन किया। पुलिस के अनुसार ट्रकों में करीब 102 से 105 मीट्रिक टन गैस मौजूद थी।
इसी बीच रायपुर की कई एजेंसियों से संपर्क किया गया और आखिरकार ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के साथ करीब 80 लाख रुपए में सौदा तय हुआ। 30 मार्च को सुपुर्दनामा प्रक्रिया पूरी कर ट्रकों को अभनपुर स्थित प्लांट ले जाया गया, जहां से गैस निकालने का खेल शुरू हुआ।
पुलिस जांच में पता चला कि 31 मार्च से लेकर 5 अप्रैल तक अलग-अलग रातों में कैप्सूलों से गैस खाली की गई। तीन दिनों के भीतर करीब 92 टन एलपीजी को प्लांट के बुलेट टैंकों, निजी टैंकरों और अन्य एजेंसियों में ट्रांसफर कर दिया गया।
जांच एजेंसियों के मुताबिक, पूरे मामले को छिपाने के लिए ट्रकों का वजन जानबूझकर देर से कराया गया। सिंघोड़ा से अभनपुर के बीच कई धर्मकांटे होने के बावजूद तत्काल तौल नहीं कराई गई। जब 6 और 8 अप्रैल को वजन कराया गया, तब तक अधिकांश कैप्सूल खाली हो चुके थे।
दस्तावेजों की जांच में कालाबाजारी के बड़े सबूत भी मिले हैं। रिकॉर्ड के अनुसार अप्रैल महीने में ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स ने केवल 47 टन एलपीजी खरीदी, जबकि बिक्री 107 टन दिखाई गई। इससे साफ हुआ कि बड़ी मात्रा में चोरी की गैस बाजार में खपाई गई। कई एजेंसियों को बिना पक्के बिल के केवल कच्चे चालान पर गैस सप्लाई किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
पुलिस का दावा है कि आरोपियों ने जांच को भटकाने और पूरा दोष पुलिस पर मढ़ने की भी तैयारी कर रखी थी। इसके लिए आरंग के एक ढाबे में बैठक कर सभी आरोपियों को एक जैसा बयान देने की रणनीति बनाई गई थी। पूछताछ शुरू होने के बाद प्लांट से जुड़े रजिस्टर और खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड भी गायब पाए गए।
महासमुंद पुलिस की 40 सदस्यीय टीम ने करीब 15 दिनों तक तकनीकी विश्लेषण, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच के बाद पूरे नेटवर्क का खुलासा किया। तकनीकी रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट हुआ कि किसी भी कैप्सूल में लीकेज नहीं था और गैस प्राकृतिक रूप से खत्म होने की संभावना नहीं थी।
फिलहाल पुलिस ने मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि फरार आरोपियों और चोरी की गैस खरीदने वाले संचालकों की तलाश जारी है। मामले में भारतीय न्याय संहिता और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा रही है।