अधिकतम 3 महीने तक कर्मचारी और नियोक्ता का पीएफ अंशदान घटाने या टालने का प्रावधान; सामान्य दिनों में 12% योगदान रहेगा लागू
नई दिल्ली (ए)। महामारी या राष्ट्रीय आपदा जैसी असाधारण परिस्थितियों में कर्मचारियों और कंपनियों को नकदी की राहत देने के लिए कर्मचारी भविष्य निधि व्यवस्था में एक विशेष प्रावधान किया गया है। इसके तहत केंद्र सरकार जरूरत पड़ने पर कर्मचारी और नियोक्ता के पीएफ योगदान की दर को सीमित अवधि के लिए कम कर सकती है या भुगतान को स्थगित कर सकती है। यह व्यवस्था पूरे देश या किसी विशेष राज्य अथवा क्षेत्र में लागू की जा सकती है। हालांकि, सामान्य परिस्थितियों में पीएफ योगदान के मौजूदा नियम में कोई बदलाव नहीं होगा।
तीन महीने तक मिल सकती है राहत
आपात स्थिति में सरकार अधिकतम तीन महीने की अवधि के लिए पीएफ योगदान को घटाने या स्थगित करने का फैसला कर सकती है। इसका उद्देश्य संकट के दौर में कर्मचारियों की हाथ में आने वाली आय बढ़ाना और नियोक्ताओं पर तत्काल वित्तीय दबाव कम करना है।
सामान्य दिनों में 12% योगदान जारी
इस प्रावधान का मतलब यह नहीं है कि हर कर्मचारी की मासिक पीएफ कटौती अपने आप कम हो जाएगी। जब तक सरकार किसी महामारी, एंडेमिक या राष्ट्रीय आपदा की स्थिति में विशेष अधिसूचना जारी नहीं करती, तब तक सामान्य नियम के अनुसार मूल वेतन का 12% कर्मचारी का पीएफ योगदान लागू रहेगा। कुछ अधिसूचित संस्थानों में लागू अलग दरों के नियम भी यथावत रहेंगे।
कर्मचारी या कंपनी अपनी इच्छा से पीएफ की वैधानिक दर को कम नहीं कर सकते। बदलाव केवल सरकार के विशेष आदेश के आधार पर ही किया जा सकेगा।
2020 में भी घटाई गई थी दर
कोविड-19 महामारी के दौरान भी कर्मचारियों और कंपनियों को राहत देने के लिए मई, जून और जुलाई 2020 के लिए पीएफ योगदान की दर 12% से घटाकर 10% की गई थी। नए प्रावधान के जरिए ऐसी असाधारण परिस्थितियों में राहत देने के लिए एक स्पष्ट कानूनी व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है।
इन-हैंड सैलरी बढ़ेगी, लेकिन जमा कम होगी
मान लीजिए किसी कर्मचारी के वेतन से हर महीने ₹6,000 पीएफ में जमा होते हैं। यदि आपातकालीन व्यवस्था के तहत योगदान घटाकर ₹5,000 कर दिया जाता है, तो कर्मचारी के हाथ में हर महीने ₹1,000 अधिक आएंगे। तीन महीने में यह राशि ₹3,000 होगी।
हालांकि, इसका दूसरा पक्ष भी है। कम योगदान होने से उसी अवधि में पीएफ खाते में ₹3,000 कम जमा होंगे। इससे उस राशि पर मिलने वाला भविष्य का ब्याज भी कम होगा और लंबे समय में रिटायरमेंट फंड पर कुछ असर पड़ सकता है।
योगदान घटाने और टालने में अंतर
योगदान घटाना: निर्धारित अवधि के लिए पीएफ की दर कम कर दी जाती है। कम की गई राशि को बाद में जमा करना जरूरी नहीं होता।
योगदान स्थगित करना: निर्धारित अवधि के लिए भुगतान को आगे के समय के लिए टाला जाता है। ऐसे मामले में बाद में बकाया योगदान जमा करना पड़ सकता है।
VPF पर क्या होगा असर
वॉलेंटरी प्रॉविडेंट फंड यानी VPF के जरिए कर्मचारी अपनी इच्छा से सामान्य अनिवार्य योगदान से अधिक राशि पीएफ में जमा कर सकते हैं। आपातकालीन प्रावधान का मुख्य संबंध वैधानिक पीएफ योगदान से है। अतिरिक्त VPF योगदान पर किसी बदलाव की स्थिति संबंधित सरकारी आदेश और लागू नियमों के आधार पर तय होगी।
EPF और VPF में अंतर समझें
EPF: कर्मचारी भविष्य निधि एक वैधानिक बचत व्यवस्था है, जिसमें कर्मचारी और नियोक्ता निर्धारित नियमों के अनुसार योगदान करते हैं।
VPF: यह कर्मचारी का स्वैच्छिक अतिरिक्त योगदान है। कर्मचारी अपनी रिटायरमेंट बचत बढ़ाने के लिए निर्धारित अनिवार्य योगदान से अधिक राशि जमा कर सकता है। इस अतिरिक्त राशि के बराबर नियोक्ता का योगदान करना जरूरी नहीं होता।