बिलासपुर की ममता की संघर्ष से सफलता तक की कहानी; 2 साल की उम्र में माता-पिता ने छोड़ा, 12वीं में जिला टॉपर बनीं और अब अंतरराष्ट्रीय कंपनी में इंजीनियर
महिला दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर की ममता कुर्रे की कहानी संघर्ष और संकल्प की मिसाल बनकर सामने आई है। बचपन में माता-पिता से बिछड़ने के बाद रिक्शा चलाने वाले नाना ने उनका पालन-पोषण किया। आर्थिक तंगी के बीच झोपड़ी में पढ़ाई करने वाली ममता आज ताइवान से एमटेक कर सेमीकंडक्टर उद्योग में इंजीनियर बनने जा रही हैं।
रायपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले की रहने वाली ममता कुर्रे की कहानी आज हजारों युवाओं, खासकर बेटियों के लिए प्रेरणा बन गई है। बेहद साधारण परिस्थितियों में पली-बढ़ी ममता अब ताइवान की एक बड़ी सेमीकंडक्टर कंपनी में इंजीनियर के रूप में काम करने जा रही हैं। उनका यह सफर संघर्ष, मेहनत और संकल्प की अनूठी मिसाल है।
ममता जब महज दो साल की थीं, तब उनके पिता घर छोड़कर चले गए। इसके बाद उनकी मां ने भी उन्हें अपने पिता के पास छोड़कर दूसरी शादी कर ली। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके नाना वेदराम ने किया, जो रोजी-रोटी के लिए रिक्शा चलाते हैं। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार स्कूल की मामूली फीस जमा करना भी मुश्किल हो जाता था।
छोटे से झोपड़े में छप्पर के नीचे बैठकर पढ़ाई करने वाली ममता ने तमाम मुश्किलों के बावजूद पढ़ाई जारी रखी। वर्ष 2017 में उन्होंने 12वीं बोर्ड परीक्षा में जिला टॉप कर सभी को चौंका दिया। यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।
12वीं के नतीजे आने के बाद एक पत्रकार द्वारा उनकी संघर्ष भरी कहानी सोशल मीडिया पर साझा की गई। इस पोस्ट के बाद प्रशासन और समाज के कई लोग उनकी मदद के लिए आगे आए। आर्थिक सहायता और मार्गदर्शन मिलने से ममता को आगे पढ़ने का अवसर मिला।
दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में उन्हें प्रवेश मिला, जहां उन्होंने फिजिक्स ऑनर्स से स्नातक और इसके बाद मास्टर की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान उन्हें सरकारी और निजी संस्थाओं की स्कॉलरशिप भी मिली, जिससे उनकी शिक्षा जारी रह सकी।
ममता का लक्ष्य सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण के क्षेत्र में काम करना था। इसी उद्देश्य से उन्होंने ताइवान जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने का निर्णय लिया। शुरुआती दौर में वहां जाने और रहने-खाने का खर्च जुटाना उनके लिए बड़ी चुनौती था। बैंक से लोन नहीं मिलने के कारण उन्हें निजी स्तर पर कर्ज लेना पड़ा।
ताइवान में पढ़ाई के दौरान उन्हें एक स्थानीय स्कॉलरशिप मिली, जिसकी शर्त थी कि हर साल उच्च ग्रेड बनाए रखना होगा। ममता ने इस चुनौती को भी स्वीकार किया और लगातार बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की।
अब ममता ने इलेक्ट्रिकल और कंप्यूटर साइंस में एमटेक पूरा कर लिया है और जल्द ही ताइवान की एक बड़ी सेमीकंडक्टर कंपनी में इंजीनियर के रूप में अपनी सेवाएं देंगी। संघर्ष से सफलता तक का उनका यह सफर महिला सशक्तिकरण और दृढ़ संकल्प की प्रेरक मिसाल बन गया है।