दूरस्थ और आदिवासी जिलों को प्राथमिकता, बलरामपुर को सर्वाधिक 1.98 करोड़, सक्ती को सबसे कम 2.70 लाख आवंटित
राज्य सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग के 1535 अतिथि शिक्षकों के लंबित एवं वर्तमान मानदेय भुगतान के लिए 13.81 करोड़ रुपए स्वीकृत किए हैं। चार से पांच माह के भुगतान को ध्यान में रखते हुए जारी इस राशि में दूरस्थ और शिक्षक कमी वाले जिलों को प्राथमिकता दी गई है। बलरामपुर को सबसे अधिक जबकि सक्ती को सबसे कम राशि मिली है।
रायपुर। राज्य सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग में कार्यरत 1535 अतिथि शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए उनके लंबित और वर्तमान मानदेय भुगतान के लिए 13 करोड़ 81 लाख रुपए मंजूर किए हैं। यह राशि 20 हजार रुपए प्रतिमाह की दर से चार से पांच माह के भुगतान को ध्यान में रखकर जारी की गई है।
सरकारी आवंटन में दूरस्थ, आदिवासी और शिक्षक कमी से जूझ रहे जिलों को विशेष प्राथमिकता दी गई है। जारी आंकड़ों के अनुसार बलरामपुर को सर्वाधिक 1 करोड़ 98 लाख रुपए मिले हैं। इसके बाद कोंडागांव को 1 करोड़ 27 लाख, बस्तर को 1 करोड़ 20 लाख, सूरजपुर को 1 करोड़ 17 लाख और कांकेर को 1 करोड़ 13 लाख रुपए आवंटित किए गए हैं।
वहीं सबसे कम राशि सक्ती जिले को 2 लाख 70 हजार रुपए मिली है। जशपुर को 9 लाख, कबीरधाम को 9 लाख 90 हजार और धमतरी को 10 लाख 80 हजार रुपए स्वीकृत किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि जिलों में अतिथि शिक्षकों की संख्या और जरूरत के आधार पर राशि का निर्धारण किया गया है।
सरकार के इस फैसले से संकेत मिलते हैं कि बस्तर और सरगुजा संभाग के दूरस्थ इलाकों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। बलरामपुर, कोंडागांव, बस्तर, सूरजपुर और कांकेर को मिलाकर कुल 6 करोड़ 75 लाख रुपए जारी किए गए हैं, जो कुल आवंटन का लगभग 49 प्रतिशत है। यदि कुल राशि को 1535 अतिथि शिक्षकों में बांटा जाए तो प्रति शिक्षक औसतन लगभग 90 हजार रुपए बैठते हैं। यह राशि करीब साढ़े चार माह के मानदेय के बराबर है, जो सरकार के 4-5 माह भुगतान दावे से मेल खाती है।
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राशि जारी होने से स्कूलों में पठन-पाठन व्यवस्था प्रभावित नहीं होगी और अतिथि शिक्षकों की उपलब्धता बनी रहेगी। विशेषकर उन क्षेत्रों में यह निर्णय अहम माना जा रहा है, जहां नियमित शिक्षकों की कमी लंबे समय से बनी हुई है।
हालांकि अतिथि शिक्षक लंबे समय से नियमित भुगतान, सेवा सुरक्षा और स्थायी समाधान की मांग करते रहे हैं। ऐसे में यह फैसला तात्कालिक राहत जरूर माना जा रहा है, लेकिन स्थायी नीति को लेकर सवाल अब भी बरकरार हैं।