पुराने और अनुपयोगी फर्नीचर को नया रूप देकर बचाए लाखों रुपये, पीड़ितों और फरियादियों के लिए भी बढ़ी सुविधाएं
नजर छोटी ही सही नजरिया बड़ा होता है । दुर्ग पुलिस के डीआईजी विजय अग्रवाल ने ऐसी ही एक पहल करते हुए थानों में वर्षों से पड़े अनुपयोगी और कंडम घोषित फर्नीचर को नया जीवन दे दिया। इस प्रयास ने जहां कबाड़ निपटान की समस्या को खत्म किया, वहीं सरकारी खजाने के लाखों रुपये की बचत भी कर दी।
दुर्ग। अक्सर देखा जाता है कि लापरवाही और उचित रखरखाव के अभाव में उपयोगी संसाधन धीरे-धीरे कबाड़ का रूप ले लेते हैं। सरकारी दफ्तरों और संस्थानों में टूटे-फूटे टेबल, कुर्सियां और अन्य सामग्री लंबे समय तक जगह घेरती रहती हैं। न तो उनका उपयोग हो पाता है और न ही उनका उचित निपटान।

दुर्ग पुलिस रेंज में इस समस्या को अलग नजरिए से देखते हुए डीआईजी विजय अग्रवाल ने एक अनोखी पहल शुरू की। उन्होंने विभिन्न थानों में पड़े अनुपयोगी और कंडम घोषित फर्नीचर को एक स्थान पर एकत्रित करने के निर्देश दिए और इसके लिए एक वर्कशॉप जैसी व्यवस्था तैयार करवाई। वहां इन पुराने फर्नीचर की मरम्मत और पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ।


डीआईजी विजय अग्रवाल ने बताया कि जब वह अलग-अलग थानों का निरीक्षण करने जाते थे तो कई स्थानों पर पीड़ितों और शिकायतकर्ताओं के बैठने तक की उचित व्यवस्था नहीं दिखाई देती थी। वहीं दूसरी ओर, टूटे हुए फर्नीचर जगह-जगह पड़े नजर आते थे। इसी स्थिति ने उन्हें इस दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने कहा कि पुलिस विभाग में रोजमर्रा के कार्यों का दबाव काफी अधिक रहता है, जिसके कारण कई बार ऐसी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान नहीं जा पाता। लेकिन यदि सही नजरिया अपनाया जाए तो बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं को भी उपयोगी बनाया जा सकता है।



इस पहल के परिणाम अब सामने आने लगे हैं। पुनर्निर्मित फर्नीचर न केवल थाना स्टाफ की सुविधा बढ़ाएंगे बल्कि थानों में आने वाले पीड़ितों, फरियादियों और शिकायतकर्ताओं को भी बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराएंगे। साथ ही नई सामग्री खरीदने पर होने वाला खर्च बचने से शासन के लाखों रुपये की भी बचत हुई है।