अक्षय तृतीया से शुरू होता है निर्माण, पारंपरिक माप और पीढ़ियों से मिले हुनर से तैयार होते हैं रथ; यात्रा के बाद पहियों सहित कई हिस्सों की होती है नीलामी
ओडिशा के पुरी में आयोजित भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी शिल्प परंपरा का भी अद्भुत उदाहरण है। हर वर्ष 220 से अधिक कारीगर 87 दिनों की मेहनत से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के लिए तीन नए रथ तैयार करते हैं। यात्रा संपन्न होने के बाद रथों के पहिए और अन्य हिस्सों की नीलामी होती है, जिनकी कीमत लाखों रुपए तक पहुंच जाती है।
पुरी (ए)। भगवान जगन्नाथ की विश्वविख्यात रथयात्रा के लिए हर वर्ष नए रथों का निर्माण किया जाता है। इस परंपरा के तहत लगभग 220 कारीगर लगातार 87 दिनों तक मेहनत कर भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के लिए तीन भव्य रथ तैयार करते हैं। आस्था और पारंपरिक शिल्पकला का यह अनूठा संगम दुनिया भर के श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
रथयात्रा के दौरान तीनों देवता अलग-अलग रथों में सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जिसे लोक परंपरा में भगवान की मौसी का घर माना जाता है। यहां सात दिन प्रवास के बाद बहुड़ा यात्रा के माध्यम से वे पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं।
रथ निर्माण की प्रक्रिया बसंत पंचमी से शुरू हो जाती है। इस दिन लकड़ियों का पूजन किया जाता है, जबकि रामनवमी पर शुभ मुहूर्त में लट्ठों की चिराई आरंभ होती है। अक्षय तृतीया से रथों का वास्तविक निर्माण प्रारंभ होता है। ओडिशा वन विभाग मंदिर प्रशासन को रथ निर्माण के लिए आवश्यक लकड़ी उपलब्ध कराता है। इसके लिए फासी, धौरा, साल, आसन, सिमिली, कदंब, गम्भारी, देवदारु सहित 13 प्रकार की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है।
रथ निर्माण की सबसे खास बात यह है कि इसमें आधुनिक इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट का सहारा नहीं लिया जाता। कारीगर पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक माप प्रणाली, विशेष लकड़ी की छड़ी और रस्सी की सहायता से प्रत्येक हिस्से का आकार तय करते हैं। सबसे पहले पहियों का निर्माण किया जाता है, इसके बाद नीचे से ऊपर की ओर पूरे रथ का ढांचा तैयार किया जाता है। यह पारंपरिक ज्ञान वर्षों से विशेष परिवारों के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंचता रहा है।
निर्माण पूरा होने के बाद सरकारी इंजीनियर रथों की तकनीकी और सुरक्षा जांच करते हैं। पहियों, धुरी, लकड़ी के जोड़ और पूरे ढांचे की जांच के बाद फिटनेस प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। इसके बाद ही रथों को यात्रा के लिए उपयोग में लाया जाता है।
रथयात्रा और उससे जुड़ी सभी धार्मिक रस्में पूरी होने के बाद मंदिर प्रशासन रथों को खोलने की प्रक्रिया शुरू करता है। इसके बाद रथों के पहिए और अन्य हिस्सों की नीलामी की जाती है। वर्ष 2025 में भगवान जगन्नाथ के रथ के एक पहिए की न्यूनतम कीमत 3 लाख रुपए, बलभद्र के रथ के पहिए की 2 लाख रुपए और सुभद्रा के रथ के पहिए की 1.50 लाख रुपए निर्धारित की गई थी। श्रद्धालु इन पवित्र अवशेषों को धार्मिक आस्था के प्रतीक के रूप में खरीदते हैं।