जींद–सोनीपत रूट पर शुरू हुई देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, डीजल और बिजली के विकल्प के रूप में हाइड्रोजन तकनीक को मिली बड़ी उड़ान
हरियाणा के जींद स्टेशन से शुक्रवार को भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन शुरू हो गया। यह ट्रेन बिना डीजल और ओवरहेड बिजली के हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से चलेगी। संचालन के दौरान इससे कार्बन उत्सर्जन नहीं होगा और उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी निकलेगा। पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में इसे भारतीय रेलवे की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
नई दिल्ली (ए)। भारत ने स्वच्छ और हरित परिवहन की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाते हुए अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरियाणा के जींद–सोनीपत रेलखंड पर शुरू कर दिया है। लगभग 89 किलोमीटर लंबे इस रूट पर चलने वाली यह ट्रेन करीब 2600 यात्रियों की क्षमता के साथ देश ही नहीं, दुनिया की सबसे अधिक क्षमता वाली हाइड्रोजन ट्रेनों में शामिल होगी।
हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक पर आधारित यह ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजनों की तुलना में पूरी तरह प्रदूषण मुक्त मानी जा रही है। इसके संचालन के दौरान धुआं या कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होगा, बल्कि केवल जलवाष्प और पानी निकलेगा। यही कारण है कि भविष्य के स्वच्छ परिवहन के रूप में हाइड्रोजन तकनीक को तेजी से अपनाया जा रहा है।
250 साल पुरानी खोज से आधुनिक तकनीक तक का सफर
हाइड्रोजन की खोज वर्ष 1776 में ब्रिटिश वैज्ञानिक हेनरी कैवेंडिश ने की थी। बाद में फ्रांसीसी वैज्ञानिक एंटोनी लैवोज़िए ने इसका नाम ‘हाइड्रोजन’ रखा, जिसका अर्थ है- ‘पानी से जन्मा’। वर्ष 1800 में वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक के जरिए पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करने का सफल प्रयोग किया। आज इसी तकनीक से ग्रीन हाइड्रोजन तैयार की जा रही है।
फ्यूल सेल तकनीक से चलती है ट्रेन
हाइड्रोजन ट्रेन में इंजन की जगह फ्यूल सेल सिस्टम लगाया जाता है। इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली पैदा होती है, जिससे मोटर संचालित होती है। इस प्रक्रिया का एकमात्र उप-उत्पाद पानी होता है, इसलिए इसे शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission) तकनीक माना जाता है।
हिंडनबर्ग हादसे के बाद बदली सोच
साल 1937 में हाइड्रोजन गैस से भरे हिंडनबर्ग एयरशिप में आग लगने से 36 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद हाइड्रोजन को लंबे समय तक खतरनाक ईंधन माना गया। हालांकि आधुनिक सुरक्षा तकनीकों और फ्यूल सेल सिस्टम के विकास ने हाइड्रोजन को फिर से भविष्य के सुरक्षित और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत के रूप में स्थापित किया है।
दुनिया के कई देशों में चल रही हैं हाइड्रोजन ट्रेनें
जर्मनी ने वर्ष 2018 में दुनिया की पहली व्यावसायिक हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन शुरू की थी। इसके बाद जापान, चीन और अमेरिका ने भी इस तकनीक को अपनाया। अब भारत भी इस सूची में शामिल हो गया है और रेलवे के हरित ऊर्जा मिशन को नई गति मिली है।
क्यों खास है हाइड्रोजन?
पीरियॉडिक टेबल का पहला तत्व हाइड्रोजन ब्रह्मांड का सबसे हल्का और सबसे अधिक पाया जाने वाला तत्व है। यह सामान्यतः पानी (H₂O) और अन्य यौगिकों में मौजूद रहता है। शुद्ध हाइड्रोजन प्राप्त करने के लिए पानी को इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया से अलग किया जाता है। भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन को पेट्रोल, डीजल और कोयले के स्वच्छ विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
क्या बदलेगी भविष्य की तस्वीर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हाइड्रोजन उत्पादन की लागत कम होती है और आवश्यक ढांचा विकसित किया जाता है, तो आने वाले वर्षों में रेलवे के साथ-साथ बस, ट्रक, जहाज और उद्योगों में भी इसका बड़े पैमाने पर उपयोग संभव होगा। भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत मानी जा रही है।