तीन साल बाद प्रमोशन रद्द कर कर्मचारियों को मूल पद पर भेजने का आदेश बरकरार; प्रशासनिक त्रुटि सुधारने का अधिकार शासन के पास
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को नियमों की अनदेखी या विभागीय त्रुटि के कारण पदोन्नति मिल जाती है, तो सरकार उसे किसी भी समय वापस ले सकती है। अदालत ने कहा कि गलत तरीके से मिली पदोन्नति से कर्मचारी को कोई स्थायी या कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं होता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के दो कर्मचारियों की पदोन्नति रद्द करने के आदेश को वैध ठहराते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी।
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अपने अहम निर्णय में कहा है कि विभागीय प्रक्रिया में हुई गलती के कारण दी गई पदोन्नति को सरकार कभी भी निरस्त कर सकती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक त्रुटि को सुधारना शासन का वैधानिक अधिकार है और ऐसी पदोन्नति के आधार पर कर्मचारी किसी स्थायी अधिकार का दावा नहीं कर सकता।
जस्टिस बीडी गुरु की एकलपीठ ने यह फैसला जल संसाधन विभाग के दो कर्मचारियों की याचिका पर सुनाया। अदालत ने वर्ष 2026 में जारी उस आदेश को सही ठहराया, जिसके तहत दोनों कर्मचारियों की पदोन्नति रद्द कर उन्हें उनके मूल पद पर वापस भेज दिया गया था।
तीन साल पहले मिला था प्रमोशन
कोरबा निवासी हीरमन दास महंत और रायगढ़ निवासी विद्याभूषण शुक्ला को 12 अप्रैल 2023 को जीप ड्राइवर से मैकेनिक ग्रेड-2 के पद पर पदोन्नत किया गया था। दोनों लगभग तीन वर्षों तक इस पद पर कार्यरत रहे और उनका नाम अंतरिम वरिष्ठता सूची में भी शामिल हो गया था।
हालांकि, 25 जून 2026 को मिनीमाता हसदेव बांगो परियोजना के मुख्य अभियंता ने विभागीय आदेश जारी कर उनकी पदोन्नति निरस्त कर दी और उन्हें मूल पद पर पदस्थ करने के निर्देश दिए।
कर्मचारियों ने दी थी चुनौती
दोनों कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया कि पदोन्नति नियमानुसार हुई थी और इसमें उनकी ओर से कोई तथ्य छिपाने या धोखाधड़ी का मामला नहीं था। उनका कहना था कि तीन वर्ष तक पद पर कार्य करने के बाद बिना विभागीय जांच के पदावनत करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
सरकार ने बताया प्रशासनिक त्रुटि
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) ने पात्रता संबंधी नियमों और आवश्यक शर्तों की अनदेखी कर पदोन्नति की अनुशंसा की थी। यह अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि विभागीय गलती को सुधारने की प्रक्रिया थी। अंतिम आदेश जारी करने से पहले संबंधित कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस देकर उनका पक्ष भी सुना गया था।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने कहा कि यह मामला किसी कर्मचारी को दंडित करने का नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया में हुई त्रुटि को सुधारने का है। केवल लंबे समय तक किसी पद पर कार्य करने से उस पद पर स्थायी अधिकार नहीं बन जाता। यदि पदोन्नति नियमों के विपरीत दी गई हो, तो शासन उसे वापस लेने के लिए पूर्णतः अधिकृत है।