तीन साल में पहली बार बढ़ी दर, महंगाई रोकने की कोशिश; ट्रम्प चाहते हैं 1% या उससे कम ब्याज, साल के अंत में एक और बढ़ोतरी के संकेत
वॉशिंगटन (ए)। अमेरिका में महंगाई के दबाव ने केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व को ब्याज दर बढ़ाने के लिए मजबूर कर दिया है। सितंबर की बैठक में फेड ने दर में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए इसे 3.75% से 4% की सीमा में कर दिया। सितंबर 2023 के बाद यह पहली बार है जब अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दर बढ़ाई है। सभी 12 सदस्यों ने वृद्धि के पक्ष में मतदान किया।
फेड चेयरमैन केविन वॉर्श ने महंगाई को अभी भी ऊंचा बताते हुए फैसले का बचाव किया है। दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ब्याज दरों में तेज कटौती चाहते हैं। उन्होंने दर को 1% या उससे कम करने की मांग की है। फेड के संकेत बताते हैं कि 2026 में एक और बढ़ोतरी हो सकती है।
1. फेड का फैसला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
अमेरिकी फेडरल रिजर्व दुनिया की सबसे प्रभावशाली केंद्रीय बैंकिंग संस्थाओं में से एक है। उसकी ब्याज दर में बदलाव का असर अमेरिका के कर्ज, निवेश और उपभोक्ता खर्च के साथ वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी पड़ता है। इस बार फेड ने महंगाई को नियंत्रित करने के लिए दर बढ़ाने का रास्ता चुना है।
2. महंगाई पर फेड की नजर क्यों?
फेड का लक्ष्य महंगाई को करीब 2% पर स्थिर रखना है। लेकिन कीमतों पर दबाव अपेक्षित गति से कम नहीं हुआ है। फेड के मुताबिक आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं और उपभोक्ता खर्च में भी मजबूती है। इसलिए केंद्रीय बैंक ने महंगाई के खिलाफ सख्त रुख बनाए रखा है।
3. टैरिफ और ऊर्जा कीमतों का कितना असर?
अमेरिकी प्रशासन की व्यापार नीति के तहत लगाए गए टैरिफ आयातित वस्तुओं की लागत को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा ईरान से जुड़े युद्ध के कारण ऊर्जा कीमतों में उछाल ने भी महंगाई की चिंता बढ़ाई है। एआई क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मांग और पूंजी खर्च को प्रभावित कर रहा है।
4. आम अमेरिकी की जेब पर क्या असर?
ब्याज दर बढ़ने का सबसे सीधा असर उधार की लागत पर पड़ सकता है। घर खरीदने, वाहन लेने या क्रेडिट कार्ड से खर्च करने वाले लोगों को ज्यादा ब्याज देना पड़ सकता है। वहीं, बचत करने वालों को कुछ जमा योजनाओं में बेहतर ब्याज मिलने की संभावना रहती है।
5. कंपनियों के लिए क्या बदलेगा?
महंगा कर्ज कारोबार की लागत बढ़ा सकता है। कंपनियां विस्तार, नई मशीनरी या नई परियोजनाओं पर खर्च को लेकर अधिक सतर्क हो सकती हैं। ऊंची ब्याज दरों से उपभोक्ता मांग में भी कमी आ सकती है। हालांकि, फेड का उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को रोकना नहीं, बल्कि महंगाई को संतुलित करना है।
6. ट्रम्प क्यों चाहते हैं कम ब्याज?
ट्रम्प का कहना है कि अमेरिका की आर्थिक और क्रेडिट स्थिति मजबूत है, इसलिए देश को कम ब्याज दर का लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने फेड से दरें तेजी से घटाने की मांग की है। 16 सितंबर के फैसले के बाद भी उन्होंने 1% या उससे कम दर की बात दोहराई।
7. फेड ने ट्रम्प की मांग क्यों नहीं मानी?
फेड अपने मौद्रिक नीति निर्णयों में महंगाई, रोजगार, आर्थिक गतिविधि और अन्य आंकड़ों को देखता है। मौजूदा समय में महंगाई को लेकर चिंता बनी हुई है। फेड चेयरमैन वॉर्श ने भी कीमतों को स्थिर करने को प्राथमिकता दी है। उन्होंने केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता पर जोर दिया है।
8. आगे क्या हो सकता है?
फेड के नीति अनुमानों के अनुसार इस साल एक और 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की संभावना बनी हुई है। हालांकि यह कोई निश्चित घोषणा नहीं है। आने वाले महीनों में महंगाई और आर्थिक आंकड़े तय करेंगे कि फेड अगली बैठक में किस दिशा में कदम उठाता है।
9. भारत पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने से वैश्विक निवेश का समीकरण बदल सकता है। अमेरिकी बॉन्ड में ज्यादा रिटर्न मिलने की उम्मीद होने पर विदेशी निवेशकों का एक हिस्सा उभरते बाजारों से अमेरिकी बाजार की ओर जा सकता है। इसका असर भारतीय शेयर बाजार और रुपये पर पड़ सकता है। हालांकि भारत पर वास्तविक प्रभाव अमेरिकी दरों के साथ-साथ घरेलू आर्थिक स्थिति, विदेशी निवेश और वैश्विक बाजारों की दिशा पर निर्भर करेगा।