मुश्किलों से वापसी, फैसलों की जिम्मेदारी, सामाजिक आत्मविश्वास, अनुशासन और लक्षित संवाद ने बनाई अलग कार्यशैली
नई दिल्ली (ए)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 सितंबर को 76 वर्ष के हो गए। करीब पांच दशक से अधिक लंबे सार्वजनिक जीवन में उनकी कार्यशैली के कई ऐसे पहलू सामने आए हैं, जिनका संबंध नेतृत्व, निर्णय लेने की शैली, आत्म-अनुशासन और लोगों के साथ संवाद से जोड़ा जाता है। उनके सार्वजनिक बयानों, राजनीतिक सफर और काम करने के तरीके को देखें तो पांच विशेषताएं बार-बार दिखाई देती हैं—मुश्किल परिस्थितियों से वापसी, फैसलों की सीधी जिम्मेदारी लेना, सामाजिक आत्मविश्वास, कठोर दिनचर्या और परिस्थिति के अनुसार संदेश देने की क्षमता। प्रधानमंत्री की आधिकारिक जीवनी भी उनके संगठनात्मक काम, प्रशासनिक भूमिका और योग-अनुशासन पर जोर देती है।
1. मुश्किलों को अवसर में बदलने की कोशिश
नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर में कई ऐसे मोड़ आए, जब उनका अगला कदम स्पष्ट नहीं था। 1990 के दशक में गुजरात भाजपा के संगठन में सक्रिय रहने के बाद उन्हें राज्य की राजनीति से हटाकर दिल्ली भेजा गया। राष्ट्रीय स्तर पर संगठन की जिम्मेदारियां संभालते हुए उन्होंने उत्तर भारत के कई राज्यों में काम किया। सितंबर 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के फोन के बाद उनका राजनीतिक जीवन एक नए चरण में पहुंचा और वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने। प्रधानमंत्री की आधिकारिक जीवनी भी 2001 में संगठनात्मक राजनीति से शासन की भूमिका में उनके बदलाव का उल्लेख करती है।
मनोविज्ञान में किसी कठिन परिस्थिति के बाद दोबारा खड़े होने की क्षमता को रेजिलिएंस कहा जाता है। इसके आगे की स्थिति को पोस्ट-ट्रॉमैटिक ग्रोथ से जोड़ा जाता है, जिसमें व्यक्ति चुनौतीपूर्ण अनुभवों से सीख लेकर अपने व्यवहार या दृष्टिकोण में बदलाव करता है।
मोदी कई मौकों पर यह कहते रहे हैं कि कठिन परिस्थितियों को अवसर में बदलने की कोशिश उनकी कार्यशैली का हिस्सा है। इस तरह के दृष्टिकोण में परिस्थितियों को नियंत्रित करने की बजाय उनके बीच उपलब्ध विकल्पों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण माना जाता है।
2. फैसले की जिम्मेदारी खुद लेने की शैली
मोदी की सार्वजनिक कार्यशैली में एक और पहलू नजर आता है—महत्वपूर्ण फैसलों को स्वयं आगे बढ़ाना और उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार करना। नोटबंदी, कोरोना लॉकडाउन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई बड़े फैसलों में प्रधानमंत्री की प्रत्यक्ष भूमिका सार्वजनिक रूप से सामने आई।
यहां मनोविज्ञान की लोकस ऑफ कंट्रोल अवधारणा प्रासंगिक है। सामान्य रूप से जिन लोगों को लगता है कि उनके फैसलों और प्रयासों का परिणाम पर प्रभाव पड़ सकता है, वे परिस्थितियों को प्रभावित करने के लिए अधिक सक्रिय भूमिका लेते हैं। हालांकि किसी व्यक्ति के बारे में इस अवधारणा के आधार पर मनोवैज्ञानिक निष्कर्ष निकालने के लिए व्यापक वैज्ञानिक आकलन जरूरी होता है।
प्रधानमंत्री ने एक साक्षात्कार में काम के दबाव से जुड़े सवाल पर कहा था कि अधूरा काम उनके लिए तनाव का कारण बनता है और सामने मौजूद काम को पूरा करने की आदत उन्होंने विकसित की है।
3. सार्वजनिक मंच पर सामाजिक आत्मविश्वास
मोदी की सार्वजनिक गतिविधियों में अनौपचारिक तरीके से लोगों से जुड़ने और अलग-अलग समूहों के बीच संवाद बनाने के कई उदाहरण मिलते हैं। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में नेताओं के साथ उनका व्यक्तिगत संपर्क और मंच पर सहज व्यवहार भी अक्सर चर्चा में रहता है।
मनोविज्ञान में सोशल बोल्डनेस का संबंध नए सामाजिक माहौल में सहजता से संवाद करने और अपनी बात रखने की क्षमता से जोड़ा जाता है। रेमंड कैटेल के व्यक्तित्व मॉडल में इसे एक आयाम के रूप में शामिल किया गया है।
हालांकि किसी सार्वजनिक व्यक्ति की कुछ तस्वीरों या घटनाओं के आधार पर उसकी पूरी व्यक्तित्व संरचना तय नहीं की जा सकती। ऐसे उदाहरण केवल उसकी सार्वजनिक शैली को समझने का एक आधार हो सकते हैं।
4. अनुशासन और दिनचर्या पर जोर
प्रधानमंत्री की कार्यशैली में दिनचर्या और योग का उल्लेख लंबे समय से मिलता रहा है। प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वे योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बताते हैं और इसे शरीर तथा मन के बीच संतुलन से जोड़ते हैं। 2018 में उन्होंने अपने सुबह के व्यायाम और प्राणायाम से जुड़ा वीडियो भी साझा किया था।
मोदी ने एक अन्य बातचीत में नींद को स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण बताया और पर्याप्त नींद लेने की सलाह दी थी। इसलिए उनके बारे में यह दावा कि वे नियमित रूप से केवल 3-4 घंटे सोते हैं, सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए; उपलब्ध सार्वजनिक बयानों से इतनी कम नींद को उनकी स्थायी दिनचर्या के रूप में निश्चित नहीं किया जा सकता।
मनोविज्ञान में सेल्फ-डिसिप्लिन का संबंध लक्ष्य के अनुरूप आदतों को नियंत्रित करने और तत्काल आकर्षण के बजाय लंबे समय के उद्देश्य पर ध्यान रखने से है। यही कारण है कि नियमित दिनचर्या को उत्पादकता और लक्ष्य-निर्धारण के अध्ययन में महत्वपूर्ण माना जाता है।
5. संदेश किस तक पहुंचाना है, यह तय करने की शैली
मोदी के सार्वजनिक भाषणों में श्रोताओं के अनुसार भाषा और संदेश बदलने के उदाहरण मिलते हैं। घरेलू कार्यक्रमों में हिंदी या भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अंग्रेजी में संदेश देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
मनोविज्ञान और संचार अध्ययन में प्रभावी संवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संदेश को श्रोता की पृष्ठभूमि, भाषा और संदर्भ के अनुरूप रखा जाए। इससे संदेश की स्पष्टता बढ़ सकती है।
मोदी की कार्यशैली में यह पहलू उनके डिजिटल और प्रत्यक्ष संवाद दोनों में दिखाई देता है। प्रधानमंत्री की आधिकारिक प्रोफाइल में भी उनके ऑनलाइन संवाद और सोशल मीडिया के व्यापक इस्तेमाल का उल्लेख है।
76 वर्ष की उम्र में नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक कार्यशैली को समझने के लिए केवल राजनीतिक फैसलों को देखना पर्याप्त नहीं है। उनके लंबे सार्वजनिक जीवन में संकट के बाद वापसी, फैसलों की जिम्मेदारी, सार्वजनिक संवाद, नियमित दिनचर्या और लक्षित संचार जैसे व्यवहारिक पहलू लगातार दिखाई देते हैं। हालांकि इनसे किसी व्यक्ति का क्लिनिकल या व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल तैयार नहीं किया जा सकता। इन्हें उनकी सार्वजनिक कार्यशैली और नेतृत्व व्यवहार के संदर्भ में ही देखना अधिक उचित है।