तेजस्वी-राहुल मुलाकात टली, सीट बंटवारे पर गतिरोध बरकरार — साथी दलों ने शुरू किया सिंबल वितरण, गठबंधन में बढ़ी बेचैनी
रायपुर/पटना। बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखों से पहले ही महागठबंधन में मतभेद की दरारें गहराने लगी हैं। सीट बंटवारे को लेकर आरजेडी और कांग्रेस के बीच तनातनी खुलकर सामने आने लगी है। दिल्ली और हरियाणा की तरह क्या बिहार में भी कांग्रेस “अकेले चलो नीति” दोहराने जा रही है? यह सवाल अब राजनीतिक हलकों में गूंज रहा है।
मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे तेजस्वी यादव और कांग्रेस नेतृत्व के बीच बातचीत अब तक ठंडी पड़ी है। दिल्ली से लौटने के बाद तेजस्वी ने “सब ठीक है” कहकर भले ही स्थिति संभालने की कोशिश की हो, लेकिन ज़मीनी हालात कुछ और कहानी बयान कर रहे हैं।
सीट बंटवारे पर अटका गठबंधन, राहुल से नहीं मिल पाए तेजस्वी
दिल्ली में आईआरसीटीसी घोटाला मामले की पेशी के बाद लालू, राबड़ी और तेजस्वी यादव की राहुल गांधी से मुलाकात तय मानी जा रही थी। लेकिन मुलाकात टल गई और तेजस्वी को केवल कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल से ही बात करने का मौका मिला।
बातचीत का नतीजा शून्य रहा — सीट बंटवारे का फार्मूला तय नहीं हो सका। तेजस्वी देर रात पटना लौट आए और बस इतना कहा कि “महागठबंधन पहले की तरह एकजुट है।” मगर अंदरखाने की हलचलें कुछ और इशारा कर रही हैं।
साथी दलों का धैर्य जवाब देने लगा, सिंबल वितरण शुरू
महागठबंधन में शामिल सीपीआई (एमएल) ने 6 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को सिंबल दे दिया है। आरजेडी ने भी लालू यादव से टिकट वितरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
हालांकि कांग्रेस अभी भी मौन है, लेकिन वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी की भूमिका ने उलझन और बढ़ा दी है। सहनी पहले 60 सीटों की मांग पर अड़े थे, अब 30 पर तैयार बताए जा रहे हैं। पर कांग्रेस अब उन्हें “डिप्टी सीएम इन वेटिंग” की भूमिका में देखने को तैयार नहीं।
कांग्रेस को मुकेश सहनी पर भरोसा नहीं, एनडीए में वापसी की चर्चा तेज
2020 के विधानसभा चुनाव में कम सीटें मिलने पर मुकेश सहनी एनडीए का रुख कर चुके थे। अब फिर से उनकी भाजपा नेताओं से मुलाकातों की खबरें राजनीतिक हलकों में गूंज रही हैं।
सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 16 से 18 अक्टूबर तक बिहार दौरे के दौरान सहनी के एनडीए में शामिल होने की घोषणा हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो महागठबंधन को एक बड़ा झटका लगेगा।
क्या कांग्रेस बिहार में भी दिल्ली दोहराने जा रही है?
हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस ने इंडिया ब्लॉक सहयोगी आम आदमी पार्टी (AAP) से गठबंधन नहीं किया था। परिणामस्वरूप वोटों का बिखराव हुआ और दोनों दलों को हार का सामना करना पड़ा।
अब बिहार में भी वही परिदृश्य बनता दिख रहा है। सीटों को लेकर जो “जिच” (रुकावट) सामने आ रही है, उससे साफ है कि कांग्रेस एक बार फिर “दिल्ली की गलती” दोहराने की राह पर है।
महागठबंधन में बेचैनी, एनडीए एकजुट
जहां एनडीए ने सीटों का बंटवारा और उम्मीदवार चयन लगभग पूरा कर लिया है, वहीं महागठबंधन अभी भी चर्चाओं में उलझा हुआ है।
जेडीयू और हम पार्टी ने सिंबल बांट दिए हैं, भाजपा अपने उम्मीदवारों को इशारों में संकेत दे चुकी है। लेकिन महागठबंधन की रणनीति अस्पष्ट है। तेजस्वी भले ही “एकजुटता” का दावा करें, लेकिन जमीनी कार्यकर्ता अब भ्रम में हैं।
बिहार की राजनीति इस समय विश्वास और वर्चस्व की खींचतान में उलझी है। तेजस्वी यादव गठबंधन की एकजुटता बनाए रखने की कोशिश में हैं, जबकि कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन फिर से पाने की रणनीति पर काम कर रही है।
पर सवाल यही है — क्या दिल्ली और हरियाणा की तरह बिहार में भी कांग्रेस के निर्णय से महागठबंधन का गणित बिगड़ जाएगा?