चार दिवसीय छठ महापर्व में आज तीसरे दिन संध्या अर्घ्य का विशेष महत्व, कल उगते सूर्य को अर्घ्य देकर पूर्ण होगा व्रत
लोक आस्था और सूर्य उपासना का महापर्व छठ आज पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि पर व्रती आज डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करेंगे। छठ पर्व को अनुशासन, आत्मसंयम और पर्यावरण संतुलन का प्रतीक माना जाता है। उत्तर भारत सहित छत्तीसगढ़ में भी श्रद्धालु पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना में लीन हैं।
रायपुर। हिंदू पंचांग के अनुसार, दिवाली के छठे दिन से आरंभ होने वाला छठ महापर्व चार दिनों तक चलता है। पहला दिन ‘नहाय-खाय’, दूसरा ‘खरना’, तीसरा ‘संध्या अर्घ्य’ और चौथा ‘उषा अर्घ्य’ के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 25 अक्टूबर से आरंभ होकर 28 अक्टूबर तक चलेगा। आज 27 अक्टूबर को पर्व का तीसरा दिन है, जब व्रती घाटों पर जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे।
वैदिक पंचांग के अनुसार, 27 अक्टूबर को सूर्योदय प्रातः 6:30 बजे और सूर्यास्त सायं 5:40 बजे होगा। इसी समय व्रती महिलाएं पवित्र नदियों और तालाबों में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करेंगी। छठी मैया की आराधना के दौरान महिलाएं 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं, जो अत्यंत कठिन माना जाता है।
छठ पर्व का समापन कल 28 अक्टूबर को कार्तिक शुक्ल सप्तमी तिथि पर होगा। इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाएगा। अर्घ्य देने के बाद व्रती ठेकुआ, फल और पंचमेवा जैसे प्रसाद का सेवन करती हैं।
पूजा विधि और सामग्री
छठ पूजा में सूर्य देव को समर्पित विशेष भोग तैयार किया जाता है। इसके लिए दो बड़ी बांस की टोकरी (पथिया और सूप) में ठेकुआ, मखाना, गन्ना, अक्षत, सुपारी, नारियल, केला, शरीफा, नाशपाती और डाभ जैसे फल रखे जाते हैं। पूजा सामग्री में कलश, डगरी, पोनिया, ढाकन और सरवा भी शामिल होते हैं। टोकरी पर सिंदूर और पिठार लगाकर सूर्य देव और छठी मैया को अर्पित किया जाता है। छठ पर्व को लोक आस्था का जीवंत प्रतीक माना गया है, जिसमें सूर्य देव की आराधना के साथ परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की मंगल कामना की जाती है।