अमृतकाल का भारत आत्मबोध और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ रहा है : डॉ. कुमुद शर्मा
छत्तीसगढ़ की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में रायपुर साहित्य उत्सव एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में उभरा है। बसंत पंचमी के पावन अवसर पर आयोजित इस उत्सव के शुभारंभ समारोह में उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने इसे प्रदेश की समृद्ध साहित्यिक परंपरा का जीवंत उत्सव बताते हुए कहा कि यह आयोजन छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय साहित्यिक फलक पर नई पहचान दिलाएगा।
रायपुर। बसंत पंचमी और छत्तीसगढ़ राज्य के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित रायपुर साहित्य उत्सव का शुभारंभ भव्य वातावरण में हुआ। उद्घाटन अवसर पर उपमुख्यमंत्री श्री अरुण साव ने देशभर से पधारे साहित्यकारों, विचारकों और साहित्य प्रेमियों का स्वागत करते हुए कहा कि रायपुर साहित्य उत्सव प्रदेश की सांस्कृतिक चेतना और साहित्यिक परंपरा का उत्सव है, जो छत्तीसगढ़ की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त करेगा।
उपमुख्यमंत्री श्री साव ने कहा कि माता शबरी, माता कौशल्या और छत्तीसगढ़ महतारी की यह पावन भूमि भगवान श्रीराम का ननिहाल रही है। ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के स्थल पर साहित्य उत्सव का आयोजन प्रदेश के लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती सदैव महान साहित्यकारों की उर्वर भूमि रही है और यह आयोजन उसी परंपरा को आगे बढ़ाने का सशक्त मंच बनेगा।
उन्होंने आयोजन समिति को बधाई देते हुए विश्वास जताया कि रायपुर साहित्य उत्सव न केवल प्रदेश की साहित्यिक पहचान को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य भी करेगा।
उद्घाटन समारोह में छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री शशांक शर्मा ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि रायपुर साहित्य उत्सव तीन माह के सतत परिश्रम और दूरदर्शी सांस्कृतिक सोच का परिणाम है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री की परिकल्पना के अनुरूप राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर इस साहित्यिक आयोजन को आकार दिया गया है, जिसका उद्देश्य पीढ़ियों के बीच साहित्य के माध्यम से संवाद स्थापित करना है।
श्री शर्मा ने कहा कि देशभर में अनेक साहित्य महोत्सव आयोजित होते हैं, लेकिन प्रतिष्ठित साहित्यकारों की सहभागिता इस आयोजन की गरिमा और विश्वसनीयता को प्रमाणित करती है।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति डॉ. कुमुद शर्मा ने “अमृतकाल में गणतंत्र” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि अमृतकाल का यह प्रारंभिक दौर स्पष्ट करता है कि देश का नेतृत्व आज़ादी की शताब्दी को स्वर्णिम शताब्दी बनाने के लिए संकल्पित है।
डॉ. शर्मा ने कहा कि अमृतकाल के पंचप्राण आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी चेतना, सांस्कृतिक दिशा और इतिहास बोध से जुड़े हैं। हमारी कला, साहित्य, लोक परंपराएं और प्रकृति से जुड़ी आस्थाएं ही भारत की आत्मा हैं। उन्होंने साहित्यकार निर्मल वर्मा के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि छोटी घटनाएं भी राष्ट्रीय चेतना और दायित्व बोध का आधार बन सकती हैं।
उन्होंने साहित्यकारों से आह्वान किया कि वे लोक, प्रकृति और संस्कृति से जुड़े सांस्कृतिक बोध को नई पीढ़ी तक पहुंचाएं, ताकि अमृतकाल का गणतंत्र भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व कर सके।