दिवंगत रामसिंह ठाकुर की अमर कृति को मिली राष्ट्रीय पहचान; बस्तर पंडुम के प्रदर्शनी स्टॉल में दिखेगी सांस्कृतिक झलक
जगदलपुर (ए)। बस्तर की लोकभाषा और संस्कृति को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने वाली ‘हल्बी रामायण’ एक बार फिर गौरव का विषय बनी है। जगदलपुर के लालबाग मैदान में आयोजित ‘बस्तर पंडुम’ कार्यक्रम के दौरान आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष इस ऐतिहासिक कृति का प्रदर्शन किया जाएगा। साहित्य और कला की इस विशेष प्रदर्शनी में हल्बी भाषा में अनुवादित श्रीरामचरित मानस और श्रीमद्भागवत गीता को प्रमुखता से रखा गया है। यह वही ग्रंथ है जिसके दोहे और चौपाइयां आज बस्तर के वनांचलों में रची-बसी परंपराओं और रीति-रिवाजों का अटूट हिस्सा बन चुके हैं।
रामसिंह ठाकुर की कठिन साधना और सांस्कृतिक चेतना का संचार
बस्तर के ‘तुलसीदास’ कहे जाने वाले दिवंगत साहित्यकार रामसिंह ठाकुर ने इस विशाल कार्य को पूरा करने के लिए अपने जीवन के 14 साल समर्पित कर दिए थे। उन्होंने वर्ष 1990 में हल्बी रामायण का कार्य पूर्ण कर इसे गांव-गांव तक पहुंचाया, जिससे समूचे बस्तर संभाग में एक नई सांस्कृतिक चेतना का संचार हुआ। रामसिंह ठाकुर ने न केवल रामायण बल्कि श्रीमद्भागवत का भी हल्बी में अनुवाद कर आदिवासी समाज की आस्था को उनकी अपनी मातृभाषा से जोड़ा। उनके द्वारा लिखे गए हल्बी गीतों का माधुर्य आज भी जगदलपुर आकाशवाणी के माध्यम से गूंजता है, जो उनकी लेखनी की लोकप्रियता का जीवंत प्रमाण है।
बहुआयामी व्यक्तित्व: कला और लोक साहित्य के संरक्षण में अतुलनीय योगदान
आदिवासी जनजाति से संबंध रखने वाले रामसिंह ठाकुर का व्यक्तित्व बेहद बहुआयामी था। वे केवल एक साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील चित्रकार, फोटोग्राफर, मूर्तिकार और पत्रकार भी थे। तीन दशकों से अधिक समय तक उन्होंने बस्तर की आदिवासी जीवनशैली और सामाजिक परिवेश को अपनी कूची और कैमरे के जरिए सहेजने का कार्य किया। उनकी प्रमुख कृतियों जैसे ‘बस्तर की लोककथाएं’ और ‘छत्तीसगढ़ की लोककथाएं’ को लोक साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है। उनके इन्हीं महान कार्यों की वजह से ओडिशा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई विश्वविद्यालयों में उनके शोध कार्यों पर आज भी अध्ययन किया जा रहा है।
राष्ट्रीय मंच पर बस्तर की लोक कला का सम्मान
वर्ष 2019 में 90 वर्ष की आयु में रामसिंह ठाकुर का निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा छोड़ी गई साहित्यिक विरासत आज भी बस्तर की धड़कन बनी हुई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष उनकी कृतियों का प्रदर्शन न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान का सम्मान है, बल्कि यह बस्तर की लोक संस्कृति और हल्बी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली एक बड़ी मान्यता भी है। इस प्रदर्शन के माध्यम से यह संदेश जा रहा है कि बस्तर की कला और परंपराएं भारतीय संस्कृति का एक अनमोल रत्न हैं, जिन्हें संरक्षित करना और बढ़ावा देना देश के लिए गौरव की बात है।