6-3 के बहुमत से निर्णय, कहा—टैरिफ लगाने का अधिकार केवल United States Congress को; अरबों डॉलर की वसूली पर उठे रिफंड के सवाल
अमेरिकी न्यायपालिका ने राष्ट्रपति की आर्थिक नीतियों पर बड़ी संवैधानिक सीमा तय कर दी है। Supreme Court of the United States ने शुक्रवार को पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा लागू किए गए ‘ग्लोबल टैरिफ’ को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यापार पर कर लगाने का अधिकार केवल संसद के पास है, न कि किसी एक व्यक्ति के पास।
वाशिंगटन/नई दिल्ली(ए)। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फैसले ने वैश्विक व्यापार जगत में हलचल मचा दी है। शीर्ष अदालत ने 6-3 के बहुमत से निर्णय सुनाते हुए ट्रम्प प्रशासन द्वारा लगाए गए व्यापक ‘रिसिप्रोकल’ या तथाकथित ‘ग्लोबल टैरिफ’ को संविधान के खिलाफ करार दिया।
चीफ जस्टिस John Roberts की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि राष्ट्रपति को ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (IEEPA) के तहत असीमित और अनिश्चितकालीन टैरिफ लगाने की खुली छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि “राष्ट्रपति के पास एकतरफा तरीके से टैरिफ थोपने की जादुई शक्ति नहीं है।”
कांग्रेस का विशेषाधिकार
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी संविधान के अनुसार कर और व्यापार नीति से जुड़े निर्णयों का अधिकार United States Congress को सौंपा गया है। ऐसे में कार्यपालिका द्वारा व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाना शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के खिलाफ है।
विभाजित रहा फैसला
जहाँ छह न्यायाधीशों ने टैरिफ को अवैध ठहराया, वहीं जस्टिस Clarence Thomas, Samuel Alito और Brett Kavanaugh ने असहमति जताते हुए प्रशासन के तर्कों का समर्थन किया। उनका मत था कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आपातकालीन परिस्थितियों में राष्ट्रपति को व्यापक अधिकार दिए जा सकते हैं।
आर्थिक असर और आगे की राह
इस निर्णय के बाद उन कंपनियों और देशों में उम्मीद जगी है, जिन पर भारी आयात शुल्क लगाया गया था। भारत, चीन और यूरोपीय देशों के निर्यातकों को राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है। साथ ही, अब तक वसूले गए अरबों डॉलर के टैरिफ को लौटाने की मांग भी तेज हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह निर्णय लागू होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थिरता लौटेगी और महंगाई पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। अमेरिकी राजनीति और वैश्विक व्यापार नीति पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला यह फैसला कार्यपालिका की शक्तियों की सीमाएं तय करने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।