मंदिरों और घरों में 50 हजार टन सोना, टॉप-10 सेंट्रल बैंकों से ज्यादा भंडार; अर्थव्यवस्था को दे सकता है नई रफ्तार
भारत में सोना सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि सबसे भरोसेमंद निवेश के रूप में देखा जाता है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारतीय घरों और मंदिरों में जमा सोने की कुल कीमत ₹830 लाख करोड़ तक पहुंच गई है, जो दुनिया के कई बड़े देशों की अर्थव्यवस्था से भी अधिक है।
नई दिल्ली (ए)। भारत में सोने के प्रति लोगों का पारंपरिक लगाव आज भी बरकरार है, और यही कारण है कि देश में निजी स्तर पर सोने का विशाल भंडार मौजूद है। उद्योग संगठन एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय घरों और मंदिरों में करीब 50,000 टन सोना रखा हुआ है, जिसकी कुल कीमत लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर (करीब ₹830 लाख करोड़) आंकी गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह भंडार दुनिया के शीर्ष 10 केंद्रीय बैंकों के कुल स्वर्ण भंडार से भी अधिक है। इतना ही नहीं, अमेरिका और चीन को छोड़कर दुनिया के अधिकांश देशों की सालाना जीडीपी से भी यह आंकड़ा ज्यादा है।
भारत में करीब 75 से 80 प्रतिशत सोना ज्वेलरी के रूप में रखा जाता है, जिसे लोग न केवल परंपरा बल्कि सुरक्षित दीर्घकालिक निवेश के रूप में भी देखते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस सोने का एक हिस्सा भी बैंकिंग सिस्टम या औद्योगिक निवेश में लाया जाए, तो देश की आर्थिक वृद्धि को नई गति मिल सकती है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक के पास 880.3 टन सोना है, जिससे भारत दुनिया में आठवें स्थान पर है। हालांकि यह अमेरिका के 8,133 टन के मुकाबले काफी कम है, लेकिन निजी स्वामित्व के मामले में भारत वैश्विक स्तर पर सबसे आगे है।
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के अनुमान के मुताबिक, हाल के वर्षों में सोने की कीमतों में आई तेजी ने भारतीय परिवारों की संपत्ति में बड़ा इजाफा किया है। जनवरी 2026 तक घरेलू सोने की कुल वैल्यू 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गई, जो देश की कुल जीडीपी का लगभग 125 प्रतिशत है।
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने की कीमत, उनके बैंक डिपॉजिट और शेयर बाजार में निवेश से करीब 75 प्रतिशत अधिक है। कुल ‘नॉन-प्रॉपर्टी वेल्थ’ में सोने की हिस्सेदारी भी लगभग 65 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो इस बात का संकेत है कि भारतीयों का भरोसा आज भी सबसे ज्यादा सोने पर ही कायम है।