करोड़ों वंचितों की पहचान अब भी अधूरी, FCRA ड्राफ्ट 2026 से विदेशी प्रभाव पर नियंत्रण की तैयारी
देश में विकास और सामाजिक न्याय की बहस के बीच एक बड़ा वर्ग अब भी हाशिए पर है। घुमंतू और विमुक्त समुदायों की अनदेखी तथा विदेशी फंडिंग के बढ़ते प्रभाव ने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
कैलाश चन्द्र
देश में सामाजिक और आर्थिक विकास के दावों के बीच एक बड़ा तबका अब भी पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। घुमंतू, अर्धघुमंतू और विमुक्त जातियों (DNT/NT/SNT) की आबादी करोड़ों में होने के बावजूद वे आज भी सरकारी योजनाओं और नीतिगत प्राथमिकताओं से दूर हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इनकी संख्या 8 से 11 करोड़ के बीच मानी जाती है, लेकिन इनके लिए न तो ठोस डेटा उपलब्ध है और न ही कोई व्यापक राष्ट्रीय कार्यक्रम।
ऐतिहासिक रूप से उपेक्षा और सामाजिक कलंक झेलते आए इन समुदायों को आज भी पहचान पत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं तक पहुंच बनाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वर्ग आज भी विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह नहीं जुड़ पाया है।
इसी बीच, देश में पहचान-आधारित मुद्दों, विशेषकर LGBTQIA++ से जुड़े अभियानों, कार्यक्रमों और गतिविधियों में तेजी से विस्तार देखने को मिला है। बीते एक दशक में इस क्षेत्र में निवेश, जागरूकता अभियानों और संस्थागत गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। कॉर्पोरेट, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और विभिन्न मंचों पर इन विषयों को प्रमुखता से उठाया जा रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, इस परिदृश्य ने संसाधनों और प्राथमिकताओं के संतुलन को लेकर बहस को जन्म दिया है। एक ओर जहां बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं दूसरी ओर पहचान-आधारित मुद्दों पर बढ़ता निवेश नीति-निर्माण की दिशा को प्रभावित करता नजर आ रहा है।
इसी संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित FCRA ड्राफ्ट 2026 को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस मसौदे का उद्देश्य विदेशी फंडिंग के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ाना, संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी सख्त करना और संभावित दुरुपयोग को रोकना है। प्रस्तावित प्रावधानों के तहत उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में कड़ी ऑडिट व्यवस्था, फंडिंग की स्पष्ट श्रेणीकरण और डिजिटल मॉनिटरिंग को अनिवार्य किया जा सकता है।
नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मसौदा प्रभावी रूप से लागू होता है, तो विदेशी फंडिंग के प्रभाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि देश की नीतियों का केंद्र उन समुदायों की ओर हो, जो लंबे समय से उपेक्षित रहे हैं।
वर्तमान परिदृश्य यह संकेत देता है कि भारत को अपने सामाजिक विमर्श और विकास की प्राथमिकताओं को संतुलित करने की आवश्यकता है, ताकि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुंच सके।
