13 महीने की बच्ची की दुर्लभ बीमारी से मौत के बाद बड़ी बेटी भी उसी बीमारी की शिकार; जिंदगी बचाने के लिए हर 15 दिन में लगती है महंगी थेरेपी
नौ साल की आद्या बाहर खेलते बच्चों को सिर्फ दूर से देख सकती है। दौड़ना, कूदना और सामान्य बचपन जीना उसके लिए खतरे से खाली नहीं है। दुर्लभ जेनेटिक बीमारी ‘पॉम्पे डिजीज’ से जूझ रही आद्या का दिल पूरी क्षमता से काम नहीं करता और उसकी जिंदगी एक ऐसी थेरेपी पर टिकी है, जिसकी सालाना लागत 72 लाख रुपये है। परिवार पहले ही इसी बीमारी के कारण अपनी 13 महीने की बेटी को खो चुका है। अब माता-पिता हर दिन एक नई उम्मीद और एक नए डर के साथ जी रहे हैं।
हैदराबाद (ए)। तेलंगाना के हिम्मतनगर में रहने वाले पुलिस कॉन्स्टेबल राज बोधुना के लिए जिंदगी पिछले कई वर्षों से एक कठिन परीक्षा बनी हुई है। एक बेटी को दुर्लभ बीमारी के कारण खोने के बाद अब उनकी दूसरी बेटी भी उसी बीमारी से लड़ रही है। हर दिन उनके लिए उम्मीद और चिंता के बीच गुजरता है, क्योंकि बेटी की जिंदगी एक महंगी चिकित्सा पर निर्भर है।
नौ वर्षीय आद्या ‘पॉम्पे डिजीज’ नामक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी के कारण उसके शरीर में आवश्यक एंजाइम नहीं बन पाते, जिससे मांसपेशियां और हृदय धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं। डॉक्टरों के अनुसार आद्या का हृदय सामान्य क्षमता से काफी कम काम कर रहा है और उसे नियमित एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ईआरटी) की आवश्यकता है।
इस उपचार के लिए हर 15 दिन में अस्पताल जाना पड़ता है। एक बार की थेरेपी में कई घंटे लगते हैं और लाखों रुपये का खर्च आता है। वर्तमान में उसकी सालाना चिकित्सा लागत करीब 72 लाख रुपये है, जो समय के साथ बढ़ती जा रही है।
राज बोधुना बताते हैं कि उनकी छोटी बेटी आयरा भी इसी बीमारी से पीड़ित थी। वर्ष 2021 में बीमारी का पता चलने के बाद डॉक्टरों ने बताया था कि बच्ची के बचने की संभावना बेहद कम है। लगातार बिगड़ती हालत के बीच 13 महीने की उम्र में उसे दो बार दिल का दौरा पड़ा और उसकी मौत हो गई। परिवार उस सदमे से आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है।
आयरा की बीमारी की जांच के दौरान डॉक्टरों ने बड़ी बेटी आद्या की भी जेनेटिक जांच कराने की सलाह दी। रिपोर्ट आने पर पता चला कि वह भी पॉम्पे डिजीज से पीड़ित है। यह जानकारी परिवार के लिए दूसरा बड़ा झटका थी।
कई वर्षों तक आर्थिक तंगी के कारण परिवार इलाज शुरू नहीं करा सका। बाद में केंद्र सरकार के रेयर डिजीज सहायता कार्यक्रम से आर्थिक मदद मिली, जिससे उपचार की शुरुआत हो सकी। इसके अलावा दवा बनाने वाली एक विदेशी कंपनी ने भी सीमित अवधि के लिए मुफ्त दवा उपलब्ध कराई, जिससे आद्या का इलाज जारी है।
हालांकि परिवार की चिंता अब भी खत्म नहीं हुई है। राज कहते हैं कि जिस दिन दवा और सहायता बंद होगी, उस दिन उनकी बेटी का भविष्य फिर अनिश्चित हो जाएगा। एक साधारण नौकरी करने वाले पिता के लिए करोड़ों रुपये के इलाज का इंतजाम कर पाना संभव नहीं है, लेकिन वे अपनी बेटी को बचाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।
डॉक्टरों ने आद्या को अधिक शारीरिक गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी है। वह स्कूल जाती है, लेकिन खेल के मैदान में अपने दोस्तों के साथ नहीं दौड़ सकती। परिवार के लिए सबसे कठिन पल तब होता है, जब वह पूछती है कि बाकी बच्चों की तरह वह सामान्य जीवन क्यों नहीं जी सकती।
एक बेटी को खोने का दर्द और दूसरी को बचाने की जद्दोजहद के बीच यह परिवार हर दिन उम्मीद का दामन थामे हुए है। उनके लिए आद्या की हर मुस्कान किसी चमत्कार से कम नहीं और हर नया दिन जिंदगी की एक नई जीत जैसा है।