गुढ़ियारी गोदाम में आग समेत अन्य घटनाओं से हुए नुकसान को टैरिफ में जोड़ने की मांग अस्वीकार, आयोग बोला- बीमा और संपत्तियों की सुरक्षा कंपनी की जिम्मेदारी।
छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग (CSERC) ने बिजली उपभोक्ताओं के हित में बड़ा फैसला सुनाते हुए छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) की 66.57 करोड़ रुपए के नुकसान को बिजली दरों में शामिल करने की मांग खारिज कर दी है। आयोग ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक लापरवाही, जोखिम प्रबंधन में कमी अथवा संपत्तियों का बीमा नहीं कराने से हुए नुकसान का भार उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता।
रायपुर। बिजली उपभोक्ताओं को राहत देते हुए छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग (CSERC) ने छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) की उस मांग को अस्वीकार कर दिया है, जिसमें कंपनी ने आगजनी से हुए 66.57 करोड़ रुपए के नुकसान की भरपाई बिजली टैरिफ के माध्यम से उपभोक्ताओं से करने की अनुमति मांगी थी। आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कंपनी की प्रशासनिक चूक, जोखिम प्रबंधन में कमी या संपत्तियों का बीमा नहीं कराने से हुए नुकसान की कीमत आम उपभोक्ताओं से नहीं वसूली जा सकती।
दरअसल, वित्तीय वर्ष 2026-27 के टैरिफ निर्धारण के दौरान बिजली वितरण कंपनी ने कुल 658.32 करोड़ रुपए को असाधारण व्यय के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया था। इसमें अप्रैल 2024 में रायपुर के गुढ़ियारी स्थित क्षेत्रीय गोदाम में शॉर्ट सर्किट से लगी आग के कारण ट्रांसफॉर्मर, केबल और अन्य विद्युत उपकरणों को हुए नुकसान के साथ-साथ भिलाई, रायगढ़ और कोरबा में हुई आगजनी की घटनाओं से हुए 66.57 करोड़ रुपए के नुकसान को भी बिजली दरों में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था।
बीमा के दस्तावेज नहीं दे सकी कंपनी
सुनवाई के दौरान आयोग ने कंपनी से प्रभावित सामग्री के बीमा संबंधी दस्तावेज मांगे। दस्तावेजों की जांच में पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए जा सके। आयोग ने कहा कि वितरण कंपनी की परिसंपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उनका बीमा कराना उसकी स्वयं की जिम्मेदारी है। यदि इस स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसका आर्थिक भार उपभोक्ताओं पर डालना न्यायसंगत नहीं होगा।
रेलवे से जुड़े दावे पर भी फिलहाल राहत नहीं
आयोग ने रेलवे से जुड़े 591.75 करोड़ रुपए के दावे को भी फिलहाल टैरिफ में शामिल करने से इनकार कर दिया। आयोग के अनुसार यह मामला अभी मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) में विचाराधीन है और अंतिम देयता तय नहीं हुई है। ऐसे में इस राशि को भी बिजली दरों में जोड़ने का कोई औचित्य नहीं बनता।
आयोग के इस फैसले को बिजली उपभोक्ताओं के हित में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि वितरण कंपनियां अपनी प्रबंधन संबंधी कमियों या प्रशासनिक लापरवाही से हुए नुकसान की भरपाई सीधे उपभोक्ताओं से नहीं कर सकतीं।