तमिलनाडु विवाद से उठा संवैधानिक सवाल, राष्ट्रपति ने न्यायपालिका की भूमिका और शक्तियों की सीमाओं पर मांगा स्पष्टिकरण
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से एक अहम सवाल पूछा है — क्या न्यायपालिका राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों के फैसलों के लिए समयसीमा तय कर सकती है, जबकि संविधान में ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है? बुधवार को उन्होंने 14 सवालों के माध्यम से कोर्ट से संवैधानिक व्याख्या और न्यायिक दखल की सीमाओं को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। यह बहस तमिलनाडु में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच बिलों को लेकर हुए गतिरोध के बाद सामने आई है।
नई दिल्ली (ए)। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक संवैधानिक बहस की शुरुआत करते हुए सुप्रीम कोर्ट से यह जानना चाहा है कि क्या न्यायपालिका राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के फैसलों के लिए कोई समयसीमा निर्धारित कर सकती है, जबकि संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
बुधवार को राष्ट्रपति मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 14 सवाल रखे, जिनमें संवैधानिक शक्तियों, न्यायिक समीक्षा, केंद्र-राज्य संबंध और अदालत की सीमाओं से जुड़ी जटिलताएं शामिल हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष रूप से बल दिया कि यदि संविधान में समयसीमा का उल्लेख नहीं है, तो क्या अदालत उसे निर्धारित कर सकती है?
तमिलनाडु विवाद से उत्पन्न मामला
यह मुद्दा तब सामने आया जब तमिलनाडु के राज्यपाल ने राज्य सरकार द्वारा पारित कई विधेयकों को मंजूरी देने में देरी की, या उन्हें राष्ट्रपति को विचारार्थ भेज दिया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल 2024 को स्पष्ट किया कि राज्यपाल के पास “वीटो पावर” नहीं है और राष्ट्रपति को तीन माह के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य होगा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में मुख्य बिंदु:
निर्णय अनिवार्य:
अनुच्छेद 201 के तहत, यदि राज्यपाल बिल को राष्ट्रपति के पास भेजते हैं, तो राष्ट्रपति को उसे स्वीकृत करना या अस्वीकृत करने का निर्णय लेना ही होगा। उसे अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
न्यायिक समीक्षा संभव:
राष्ट्रपति का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है, विशेष रूप से यदि बिल को केंद्र सरकार या राज्य की कैबिनेट की सलाह के विरुद्ध रोका गया हो।
समयसीमा का पालन:
राष्ट्रपति को बिल मिलने के तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। विलंब की स्थिति में उसे कारण स्पष्ट करने होंगे।
बिल को बार-बार नहीं लौटाया जा सकता:
यदि एक बार राष्ट्रपति ने बिल को पुनर्विचार के लिए वापस भेजा और विधानसभा ने उसे फिर से पारित किया, तो अब राष्ट्रपति को अंतिम निर्णय देना ही होगा। बार-बार लौटाने की प्रक्रिया असंवैधानिक मानी जाएगी।
- राष्ट्रपति मुर्मू के 14 सवालों में कुछ प्रमुख बिंदु:
क्या संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत राज्यपाल के निर्णयों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है? - क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के निर्णयों को संशोधित कर सकता है?
- क्या न्यायपालिका ऐसे निर्देश जारी कर सकती है जो संविधान या वर्तमान कानूनों के अनुरूप न हों?
- क्या सुप्रीम कोर्ट को संविधान से जुड़े हर विवाद को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजना अनिवार्य है?
राष्ट्रपति द्वारा उठाए गए ये सवाल न केवल संवैधानिक व्यवस्था की जटिलताओं को उजागर करते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिकाएं कितनी सुस्पष्ट और संतुलित होनी चाहिए। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट इन सवालों पर क्या रुख अपनाता है और क्या यह भारत के संघीय ढांचे में नए संवैधानिक दिशानिर्देश तय करेगा।