न्यायालय ने सभी राज्यों से समयबद्ध जांच, आरोप-पत्र दाखिल करने और मुकदमे निपटाने की प्रक्रिया पर जोर दिया
बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को निर्देशित किया है कि वे पॉक्सो मामलों की सुनवाई के लिए समर्पित अदालतों की स्थापना सर्वोच्च प्राथमिकता पर करें। कोर्ट ने कहा कि विशेष अदालतों की कमी के कारण समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा है।
नई दिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष पॉक्सो अदालतों की स्थापना सर्वोच्च प्राथमिकता पर की जाए। कोर्ट ने यह टिप्पणी बच्चों के यौन शोषण की घटनाओं में बढ़ोतरी और लंबित मामलों की गंभीरता को देखते हुए की।
न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने कहा कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत चल रहे मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है, जबकि इन मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की संख्या अपर्याप्त है, जिससे कानून में तय समय-सीमा का पालन नहीं हो पा रहा है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:
जिन जिलों में 300 से अधिक पॉक्सो मामले लंबित हैं, वहां कम से कम दो विशेष अदालतें स्थापित की जानी चाहिए।
जहां 100 से अधिक एफआईआर दर्ज हैं, वहां कम से कम एक विशेष अदालत होनी ही चाहिए — जैसा कि जुलाई 2019 के आदेश में कहा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे पुलिस अधिकारियों और जांच एजेंसियों को बच्चों के साथ संवेदनशीलता से व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षण दें, ताकि न्याय प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी या संवेदनहीनता न हो।
कोर्ट ने यह भी बताया कि कुछ राज्यों — जैसे तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और महाराष्ट्र — ने अब तक केंद्र के निर्देशों के अनुसार पर्याप्त अदालतें स्थापित नहीं की हैं, जबकि अधिकांश राज्यों ने केंद्र की सहायता से ऐसा कर लिया है। इससे पहले वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरी और उत्तरा बब्बर को न्यायालय द्वारा पॉक्सो अदालतों की वर्तमान स्थिति पर राज्यवार विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था।