सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष साबित होने के बाद वर्षों तक जेल में बिताने वालों के लिए मुआवज़ा कानून की आवश्यकता जताई, कहा- यह संसद का विषय है
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा है कि यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक जेल में बंद रहा और बाद में निर्दोष साबित हुआ, तो उसे मुआवजा मिलना चाहिए। अदालत ने इस दिशा में एक ठोस कानून बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है और इसे संसद के अधिकार क्षेत्र में बताया है।
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि जिन लोगों को लंबे समय तक जेल में बंद रखा गया और बाद में वे निर्दोष साबित हुए, उन्हें न्यायिक क्षतिपूर्ति यानी मुआवज़ा मिलना चाहिए। कोर्ट ने इस मुद्दे पर एक अलग क़ानून बनाए जाने की आवश्यकता जताई है, ताकि ऐसे पीड़ितों को न्याय मिल सके।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 15 जुलाई को एक ऐसे व्यक्ति को बरी करते हुए की, जिसे पहले मौत की सज़ा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में निर्दोष पाया गया। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मसले को मानवाधिकारों से जुड़ा हुआ बताया।
फैसले में जस्टिस संजय करोल ने लिखा कि अमेरिका जैसे देशों में गलत तरीके से सलाखों के पीछे डाले गए लोगों को अदालतों द्वारा मुआवज़ा दिया जाता है। वहां के राज्य और संघीय कानून इस बात को मान्यता देते हैं कि निर्दोष साबित होने पर व्यक्ति को उचित मुआवज़ा मिले।
भारत में हालांकि, अभी तक ऐसा कोई स्पष्ट क़ानून नहीं है। भारतीय विधि आयोग की 277वीं रिपोर्ट में भले ही इस विषय पर विचार हुआ, लेकिन वह सिर्फ दुर्भावनापूर्ण अभियोजन तक सीमित रहा। रिपोर्ट में उन मामलों पर सीधा विचार नहीं किया गया, जहां बिना किसी दुर्भावना के भी निर्दोष व्यक्ति जेल में बंद रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी निर्दोष को सालों तक हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार – का खुला उल्लंघन है। इसलिए वह मुआवज़े का हकदार है, भले ही अदालतों में इसके आधार अलग-अलग हो सकते हैं।