1925 में पांच स्वयंसेवकों के साथ हुई शुरुआत, अब 83 हजार से अधिक शाखाओं तक फैला संगठन; सत्ता और समाज दोनों पर गहरी पकड़
नागपुर के मोहिते वाडा में विजयदशमी के दिन रखी गई एक छोटी-सी नींव आज वटवृक्ष बन चुकी है। पांच स्वयंसेवकों के साथ शुरू हुआ यह प्रयोग एक शताब्दी बाद देश के सबसे प्रभावशाली संगठनों में गिना जाता है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की कल्पना से जन्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अब न केवल भारतीय राजनीति का वैचारिक आधार है, बल्कि भाजपा के माध्यम से सत्तारूढ़ व्यवस्था का निर्णायक केंद्र भी बन गया है।
नई दिल्ली (ए)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का इतिहास भारत के राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों का साक्षी है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में इसकी नींव रखी। उनका मानना था कि भारत की सबसे बड़ी कमजोरी हिंदू समाज की फूट है। इस सोच को संगठनात्मक रूप देने के लिए उन्होंने पहली शाखा शुरू की।
शुरुआती दशकों में संघ ने अनुशासन और वैचारिक एकजुटता पर ज़ोर दिया। 1940 में हेडगेवार के निधन के बाद गुरु गोलवलकर ने संगठन को नई दिशा दी और प्रचारक प्रणाली स्थापित की, जिसने आगे चलकर अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं को गढ़ा। आज़ादी के बाद गांधी हत्या के आरोप में लगे प्रतिबंध से उभरते हुए संघ ने अपना संविधान बनाया और कई सहयोगी संगठनों की नींव डाली।
आपातकाल के दौरान संघ ने पहली बार सक्रिय राजनीतिक भूमिका निभाई। देवरस ने संगठन को आधुनिक स्वरूप दिया और राम जन्मभूमि आंदोलन के बीज बोए। इसके बाद रज्जू भैया और सुदर्शन के नेतृत्व में संघ ने सत्ता और विचारधारा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की।
मोहन भागवत के कार्यकाल में संघ का प्रभाव और तेज़ी से बढ़ा। शाखाओं की संख्या दोगुनी होकर 83 हजार से अधिक हो गई। राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 हटाने जैसे लक्ष्यों की पूर्ति हुई। भागवत ने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाई और महिलाओं की भागीदारी पर भी ज़ोर दिया।
आज संघ एक सदी का सफर पूरा करते हुए केवल एक संगठन नहीं रहा, बल्कि भारत के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक परिदृश्य का निर्णायक तत्व बन चुका है।