ऐतिहासिक गिरावट के बाद जल उठा तेहरान; सेंट्रल बैंक प्रमुख के इस्तीफे ने बढ़ाई सरकार की धड़कनें, क्या फिर से होने वाली है कोई बड़ी क्रांति?
तेहरान (ए) । ईरान इस वक्त अपने इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है। देश की मुद्रा ईरानी रियाल में रिकॉर्ड गिरावट के बाद हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। महंगाई आसमान छू रही है, आम लोगों की बचत खत्म हो चुकी है और रोजमर्रा की जरूरतें आम नागरिकों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। हालात इतने बिगड़ गए कि आर्थिक असंतोष अब खुले जनविद्रोह में बदल चुका है। राजधानी तेहरान समेत कई बड़े शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। बढ़ते जनदबाव के बीच ईरान के सेंट्रल बैंक प्रमुख मोहम्मद रज़ा फरजीन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह कदम सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। विशेषज्ञ इसे आने वाले बड़े राजनीतिक संकट की शुरुआत बता रहे हैं।
करेंसी की तबाही: जब कागज के टुकड़े के बराबर रह गई रियाल की कीमत
ईरान की राष्ट्रीय मुद्रा ‘रियाल’ की कीमत में आई इस ऐतिहासिक गिरावट ने पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को चौंका दिया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रियाल अब तक के सबसे निचले स्तर यानी 14 से 18 लाख प्रति डॉलर के आंकड़े को छू चुका है। इस गिरावट का असर यह हुआ कि आम नागरिक की महीने भर की कमाई अब एक हफ्ते के राशन के लिए भी कम पड़ने लगी है। बाजारों में अफरा-तफरी का माहौल है और लोग अपनी बची-कुची जमापूंजी को सोने या अन्य संपत्तियों में बदलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वहां भी कीमतें सातवें आसमान पर पहुंच चुकी हैं। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी प्रतिबंधों और आंतरिक कुप्रबंधन ने मिलकर ईरान की कमर तोड़ दी है, जिससे उबरना अब मुमकिन नहीं लग रहा।
ग्रैंड बाज़ार का ऐतिहासिक शटडाउन: व्यापारियों ने भरी सरकार के खिलाफ हुंकार
ईरान की राजनीति और अर्थव्यवस्था का दिल कहे जाने वाले तेहरान के ‘ग्रैंड बाज़ार’ में सन्नाटा पसरा हुआ है, लेकिन सड़कों पर व्यापारियों का सैलाब उमड़ पड़ा है। ऐतिहासिक रूप से यह बाज़ार जब-जब बंद हुआ है, तब-तब ईरान की सत्ता हिल गई है। सादी स्ट्रीट और बाज़ार के मुख्य हिस्सों में दुकानदारों ने अपने शटर गिरा दिए हैं और खुलेआम सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि सामान की कीमतें हर घंटे बदल रही हैं, जिससे व्यापार करना असंभव हो गया है। 1979 की इस्लामिक क्रांति की यादें ताजा करते हुए ये प्रदर्शनकारी अब अन्य शहरों के व्यापारियों से भी हड़ताल में शामिल होने की अपील कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
दमन के बावजूद नहीं थम रहा आक्रोश: कई शहरों में पुलिस और जनता के बीच हिंसक झड़प
विरोध की यह आग सिर्फ राजधानी तेहरान तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इस्फहान, शिराज और मशहद जैसे महत्वपूर्ण शहरों को भी अपनी चपेट में ले चुकी है। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों ने आंसू गैस के गोलों और लाठीचार्ज का सहारा लिया है, लेकिन जनता का गुस्सा थमता नजर नहीं आ रहा। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे प्रदर्शनकारी अब सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। कई इलाकों में मोबाइल इंटरनेट की सेवाएं बाधित कर दी गई हैं ताकि प्रदर्शनकारी एकजुट न हो सकें। यह आंदोलन साल 2022 के महसा अमीनी विद्रोह के बाद का सबसे तीव्र और व्यापक जनआंदोलन बनता जा रहा है।
सत्ता की हार: सेंट्रल बैंक चीफ का इस्तीफा और आर्थिक कुप्रबंधन की स्वीकारोक्ति
ईरान की सरकार के लिए सबसे शर्मनाक स्थिति तब पैदा हुई जब सेंट्रल बैंक के प्रमुख मोहम्मद रज़ा फरजीन ने दबाव में आकर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। फरजीन ने जब साल 2022 में कार्यभार संभाला था, तब उन्हें उम्मीद थी कि वे मुद्रा को स्थिर कर पाएंगे, लेकिन उनके कार्यकाल में रियाल की कीमत में 300 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। सरकारी टीवी चैनल पर उनके इस्तीफे की खबर ने देश के भीतर यह संदेश दे दिया है कि प्रशासन के पास इस संकट का कोई समाधान नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह इस्तीफा सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि यह ईरान की मौजूदा आर्थिक व्यवस्था के पूरी तरह से विफल होने का एक बड़ा सबूत है।
आगामी संकट की आहट: क्या फिर से तख्तापलट की ओर बढ़ रहा है ईरान?
आर्थिक विशेषज्ञों और वैश्विक रणनीतिकारों का मानना है कि यह केवल एक वित्तीय संकट नहीं है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक लावा है जो कभी भी फट सकता है। जब रोटी और दवाई जैसी बुनियादी चीजें आम जनता की पहुंच से बाहर हो जाती हैं, तो विद्रोह को दबाना मुश्किल हो जाता है। ईरान पर लगे कड़े प्रतिबंधों और विदेशी निवेश की कमी ने पहले ही देश को अलग-थलग कर दिया है। अब जिस तरह से मध्यम वर्ग और व्यापारी वर्ग एक साथ सड़कों पर आए हैं, उससे यह आशंका बढ़ गई है कि आने वाले दिनों में ईरान में कोई बड़ा सत्ता परिवर्तन या गृहयुद्ध जैसी स्थिति देखने को मिल सकती है। पूरी दुनिया की नजरें अब तेहरान की सड़कों पर टिकी हुई हैं।