कोर्ट के आदेश पर घर खाली कराने पहुंची पुलिस के सामने आत्मदाह 95 प्रतिशत झुलसी महिला ने 8 दिन बाद अस्पताल में दम तोड़ा
दुर्ग (ए) : दुर्ग जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है जिसने पूरे प्रदेश की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता को झकझोर कर रख दिया है। कोर्ट के आदेश का पालन कराने पहुंची पुलिस और न्यायिक टीम के सामने ही महिला कांग्रेस कार्यकर्ता शबाना निशा उर्फ रानी ने खुद को आग के हवाले कर दिया था। करीब 95 प्रतिशत तक झुलस चुकी शबाना ने रायपुर के डीकेएस अस्पताल में आठ दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष किया, लेकिन अंततः शुक्रवार शाम उनकी सांसें थम गईं। यह घटना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है कि आखिर पुलिस की मौजूदगी में एक महिला ने इतना आत्मघाती कदम कैसे उठा लिया।
मकान खाली कराने की जिद और खाकी की मौजूदगी में भड़की आग की लपटें
यह सनसनीखेज मामला दुर्ग सिटी कोतवाली थाना क्षेत्र के पचरीपारा का है। 22 जनवरी की दोपहर करीब 2:30 बजे, जब डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के आदेश पर पुलिस और कोर्ट का स्टाफ शबाना के घर पर कब्जा दिलाने पहुंचा था, तभी विवाद की स्थिति निर्मित हुई। बातचीत के दौरान शबाना अचानक घर के अंदर गईं और मिट्टी तेल डालकर खुद को आग लगा ली। जब वह जलती हुई हालत में बाहर निकलीं, तो मौके पर मौजूद अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के हाथ-पांव फूल गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पुलिस तमाशबीन बनी रही, जबकि स्थानीय लोगों ने चादर की मदद से आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन तब तक शबाना का शरीर बुरी तरह जल चुका था।
45 साल का आशियाना छिनने का गम: किराएदार और मकान मालिक के बीच की जंग का खौफनाक अंत
परिजनों के मुताबिक, शबाना पिछले 40 से 45 वर्षों से उसी मकान में किराएदार के रूप में रह रही थीं। वह चाहती थीं कि मकान मालिक वह घर उन्हें बेच दे, लेकिन मकान मालिक इसके लिए तैयार नहीं था। पिछले 4-5 महीनों से उन पर घर खाली करने का भारी दबाव बनाया जा रहा था। मामला अदालत तक पहुंचा और कोर्ट ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कब्जा दिलाने का आदेश दिया। इसी आदेश को तामील कराने पहुंची टीम की संवेदनहीनता और बरसों पुराना आशियाना उजड़ने के डर ने शबाना को इस खौफनाक कदम की ओर धकेल दिया।
सक्रिय राजनीति से श्मशान तक का सफर: पार्षद चुनाव भी लड़ चुकी थीं शबाना
शबाना निशा सिर्फ एक आम नागरिक नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी की एक जुझारू और सक्रिय महिला कार्यकर्ता थीं। उन्होंने पिछले नगरीय निकाय चुनाव में दुर्ग नगर निगम के वार्ड क्रमांक 28 (पचरीपारा) से कांग्रेस के टिकट पर पार्षद पद का चुनाव भी लड़ा था। उनके राजनीतिक रसूख के बावजूद सिस्टम ने जिस तरह का रुख अपनाया, उससे अब राजनीतिक गलियारों में भी भारी आक्रोश देखा जा रहा है। उनकी मौत के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या सिस्टम सिर्फ कागजी आदेशों को लागू करने के लिए होता है, या उसमें मानवीय संवेदनाओं के लिए भी कोई जगह बची है?
बड़ा सवाल: क्या मौके पर मौजूद पुलिस और प्रशासन जान बचा सकता था?
शबाना की मौत ने दुर्ग पुलिस और प्रशासनिक अमले को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जब टीम संवेदनशील कार्रवाई के लिए गई थी, तो सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं थे? क्या शबाना को आग लगाने से रोका नहीं जा सकता था? 95% झुलसने तक सिस्टम क्या कर रहा था? अब यह मामला सिर्फ एक सुसाइड नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक विफलता और जवाबदेही का एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। पूरा शहर अब शबाना के लिए इंसाफ और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग कर रहा है।