2026-27 से ‘वन एंट्री पॉइंट’ लागू; सीटें दोगुनी से अधिक बढ़ीं, निजी स्कूलों की मनमानी पर लगेगा अंकुश
आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने की दिशा में राज्य सरकार ने अहम फैसला लिया है। शैक्षणिक सत्र 2026-27 से Right of Children to Free and Compulsory Education Act (आरटीई) के तहत अब केवल कक्षा पहली को ही प्रवेश का एकमात्र एंट्री पॉइंट बनाया गया है। सरकार का दावा है कि इससे सीट निर्धारण में पारदर्शिता आएगी और निजी स्कूलों द्वारा की जा रही अनियमितताओं पर रोक लगेगी।
रायपुर। छत्तीसगढ़ में आरटीई प्रवेश प्रक्रिया को लेकर बड़ा नीतिगत परिवर्तन किया गया है। अब तक नर्सरी, केजी-1 और कक्षा पहली—तीनों स्तरों पर प्रवेश की व्यवस्था थी, लेकिन नए सत्र 2026-27 से केवल कक्षा पहली के जरिए ही दाखिला दिया जाएगा।
सरकार के अनुसार, पूर्व व्यवस्था में कुछ निजी स्कूल नर्सरी की सीमित क्षमता दिखाकर आरटीई सीटों की संख्या कम घोषित करते थे, जबकि कक्षा पहली में अधिक सेक्शन संचालित किए जाते थे। इससे पात्र बच्चों को मिलने वाली सीटों में कमी आ रही थी और अधिनियम का उद्देश्य प्रभावित हो रहा था।
UDISE डेटा बनेगा आधार
नई व्यवस्था में आरटीई सीटों का निर्धारण कक्षा पहली में पिछले वर्ष दर्ज विद्यार्थियों की संख्या के आधार पर किया जाएगा। इसके लिए UDISE पोर्टल के आंकड़ों को मानक बनाया गया है। इससे स्कूलों द्वारा गलत या भ्रामक जानकारी देने की संभावना कम होगी और सीट आवंटन प्रक्रिया अधिक जवाबदेह बनेगी।
सीटों में रिकॉर्ड वृद्धि
नीति परिवर्तन का असर आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है। पिछले वर्ष कक्षा पहली में 9,375 आरटीई सीटें घोषित की गई थीं, जबकि आगामी सत्र 2026-27 में यह संख्या बढ़कर 19,489 हो गई है। इसके अतिरिक्त, वर्तमान में केजी-2 में अध्ययनरत 35,335 विद्यार्थी अगले सत्र में कक्षा पहली में प्रवेश करेंगे। इस प्रकार कुल 54,824 बच्चों को आरटीई के तहत लाभ मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
सरकार का दावा, शिक्षा में आएगी पारदर्शिता
राज्य सरकार का कहना है कि यह कदम न केवल सीटों की संख्या बढ़ाएगा, बल्कि निजी स्कूलों में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में भी मददगार होगा। हालांकि कुछ निजी संस्थानों ने इस निर्णय पर असहमति जताई है, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्राथमिकता कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के हितों की रक्षा करना है।
नई व्यवस्था से यह उम्मीद की जा रही है कि शिक्षा का अधिकार कानून का लाभ सही पात्र बच्चों तक पहुंचेगा और उन्हें एक स्थिर एवं बेहतर शैक्षणिक माहौल मिल सकेगा।