शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप से जताई अनिच्छा; सुनवाई से पहले ही याचिकाकर्ता ने लिया आवेदन वापस
बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम पर मस्जिदों और धार्मिक ढांचों के निर्माण एवं नामकरण पर रोक लगाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान अदालत ने इस विषय में हस्तक्षेप को लेकर अनिच्छा दिखाई, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने स्वयं ही याचिका वापस ले ली।
नई दिल्ली (ए)। देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था Supreme Court of India ने बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम पर किसी भी नई मस्जिद अथवा धार्मिक संरचना के निर्माण और नामकरण पर रोक लगाने की मांग संबंधी याचिका पर सुनवाई से परहेज किया। अदालत के रुख के बाद याचिकाकर्ता की ओर से आवेदन वापस लेने का अनुरोध किया गया, जिसे स्वीकार करते हुए मामले का निस्तारण कर दिया गया।
यह प्रकरण न्यायमूर्ति Vikram Nath और न्यायमूर्ति Sandeep Mehta की पीठ के समक्ष आया था। प्रारंभिक विचार-विमर्श के दौरान ही पीठ ने संकेत दिया कि वह इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं है। इसके बाद याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। अदालत ने संक्षिप्त आदेश में कहा कि याचिका वापस लिए जाने के कारण इसे खारिज किया जाता है।
क्या थी याचिका में मांग
याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ संबंधित प्रशासनिक निकायों को निर्देश जारी करने की मांग की गई थी कि वे बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम पर किसी भी नई मस्जिद या धार्मिक ढांचे के निर्माण, स्थापना या नामकरण को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाएं। इसके अतिरिक्त, भविष्य में ऐसे नामकरण पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने की भी मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया था कि ऐतिहासिक रूप से आक्रमण से जुड़े व्यक्तियों के नाम पर धार्मिक संरचनाओं का नामकरण सामाजिक सौहार्द की दृष्टि से उचित नहीं है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की कथित प्रतिकृति निर्माण की घोषणा का भी उल्लेख किया गया था।
कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं
हालांकि शीर्ष अदालत ने इस विषय पर कोई विस्तृत टिप्पणी या आदेश पारित नहीं किया और सुनवाई आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। अदालत के इस रुख से स्पष्ट है कि फिलहाल इस मुद्दे पर न्यायिक स्तर पर कोई नया निर्देश जारी नहीं होगा।
उल्लेखनीय है कि नवंबर 2019 में Supreme Court of India की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अयोध्या भूमि विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसमें विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हुए सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए वैकल्पिक पांच एकड़ भूमि देने का निर्देश केंद्र सरकार को दिया गया था। वर्तमान याचिका उस निर्णय से अलग एक नए मुद्दे से संबंधित थी, जिसे अदालत ने विचार योग्य नहीं माना।