ईरान की ऊर्जा लाइफलाइन पर वार से बढ़ा तनाव; खाड़ी देशों तक फैला संघर्ष, होर्मुज जलडमरूमध्य बना रणनीतिक हथियार
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने अब खतरनाक मोड़ ले लिया है। ईरान के सबसे बड़े गैस क्षेत्र साउथ पार्स पर हुए हमले के बाद क्षेत्रीय तनाव तेजी से बढ़ा और कई देशों की भागीदारी से यह टकराव व्यापक युद्ध की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है।
नई दिल्ली/तेहरान (ए)। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब निर्णायक चरण में पहुंच गया है, जहां ईरान के प्रमुख गैस हब ‘साउथ पार्स’ पर अमेरिका और इजरायल के हमले ने हालात को और गंभीर बना दिया है। इस हमले को ईरान ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा प्रहार मानते हुए आक्रामक जवाबी रणनीति अपनाई, जिससे पूरा खाड़ी क्षेत्र संघर्ष की चपेट में आ गया।
क्यों अहम है साउथ पार्स?
साउथ पार्स को दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस क्षेत्र माना जाता है और यह ईरान की ऊर्जा व्यवस्था की रीढ़ है। देश की करीब 80 प्रतिशत गैस आपूर्ति इसी क्षेत्र से होती है, जिससे बिजली उत्पादन, घरेलू उपयोग और औद्योगिक गतिविधियां संचालित होती हैं। यह गैस क्षेत्र कतर के साथ साझा है, जहां इसे ‘नॉर्थ फील्ड’ के नाम से जाना जाता है। ऐसे में इस पर हमला ईरान की ‘ऊर्जा लाइफलाइन’ को सीधे प्रभावित करने वाला कदम माना गया।
हमले के बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई
हमले के बाद ईरान ने सख्त रुख अपनाते हुए खाड़ी क्षेत्र में कई ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया। सऊदी अरब, यूएई, ओमान और बहरीन में ड्रोन और मिसाइल हमलों के जरिए ऊर्जा सप्लाई चेन को बाधित करने की कोशिश की गई। इससे यह संघर्ष द्विपक्षीय न रहकर बहुपक्षीय संकट में बदल गया।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना दबाव का केंद्र
ईरान ने रणनीतिक रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य पर पकड़ मजबूत कर वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बनाया। यह मार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल यूरोप और एशिया को भेजा जाता है। टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा संकट की स्थिति बनने लगी है।
अमेरिका की सतर्कता और चेतावनी
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अमेरिका ने भी अपने रुख में सतर्कता दिखाई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल को साउथ पार्स पर दोबारा हमले से बचने की सलाह दी है, साथ ही ईरान को चेतावनी दी है कि आक्रामकता जारी रहने पर कड़ा जवाब दिया जाएगा।
वैश्विक असर गहराया
इस पूरे घटनाक्रम का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल, शेयर बाजारों में अस्थिरता और ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर बढ़ता दबाव, इस संकट के प्रमुख प्रभावों में शामिल हैं।
क्या बढ़ेगा टकराव?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे, तो यह टकराव व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है, जिसमें मिडिल ईस्ट के कई देश सीधे तौर पर शामिल हो सकते हैं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस संवेदनशील क्षेत्र पर टिकी हुई है।