मोदी-शाह-साय की रणनीति से 60 साल पुराने संकट पर काबू; शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के विस्तार का दौर शुरू
छत्तीसगढ़ के बस्तर और आदिवासी क्षेत्रों में दशकों से विकास की राह में बाधा बने नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के साथ अब बदलाव की बयार तेज हो गई है। सुरक्षा और विकास के समन्वित प्रयासों ने क्षेत्र को एक नए युग की ओर अग्रसर कर दिया है।
रायपुर। देश की आंतरिक सुरक्षा और विकास यात्रा के लिए लंबे समय तक चुनौती बने रहे नक्सलवाद पर अब निर्णायक प्रहार होता नजर आ रहा है। केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त रणनीति के चलते छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर क्षेत्र में हालात तेजी से बदल रहे हैं। सांसद बृजमोहन अग्रवाल का कहना है कि आने वाले समय में इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, राशन और रोजगार की सुविधाएं तेजी से विस्तार लेंगी।
नक्सलवाद की जड़ें 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से जुड़ी हैं, जो समय के साथ देश के कई राज्यों में फैलता हुआ तथाकथित ‘रेड कॉरिडोर’ का रूप ले गया। छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र इसकी सबसे बड़ी मार झेलता रहा, जहां वर्षों तक प्रशासनिक पहुंच सीमित रही और नक्सलियों ने समानांतर व्यवस्था स्थापित कर ली।
समय के साथ यह आंदोलन अपनी वैचारिक दिशा से भटककर हिंसा और उगाही का माध्यम बन गया। खनिज संपदा से भरपूर क्षेत्रों में ठेकेदारों, व्यापारियों और सरकारी परियोजनाओं से वसूली इसका प्रमुख स्रोत बन गई।
विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्ववर्ती दशकों में स्पष्ट नीति के अभाव और राजनीतिक असमंजस के चलते नक्सलवाद को नियंत्रित करने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। हालांकि, हाल के वर्षों में केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय और सख्त रणनीति के कारण स्थिति में बड़ा बदलाव आया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सुरक्षा बलों ने लगातार अभियान चलाते हुए नक्सली नेटवर्क को कमजोर किया है। बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जबकि कई को गिरफ्तार या निष्क्रिय किया गया है।
अब बस्तर और आसपास के क्षेत्रों में विकास कार्यों ने गति पकड़ ली है। सड़कों का विस्तार, मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता, बैंकिंग सेवाओं की पहुंच और शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार से जनजीवन में सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल का कहना है कि यह बदलाव केवल भौतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी दिख रहा है। जहां कभी भय और हिंसा का माहौल था, वहां अब लोकतंत्र और विकास की जड़ें मजबूत हो रही हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अब सबसे बड़ी चुनौती इस बदलाव को स्थायी बनाना है। आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं के पुनर्वास, कौशल विकास और रोजगार के अवसरों पर विशेष ध्यान देना होगा, ताकि वे मुख्यधारा में शामिल होकर समाज के विकास में योगदान दे सकें।
नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के साथ छत्तीसगढ़ एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां ‘बुलेट’ की जगह ‘बैलेट’ और विकास की ताकत हावी होती नजर आ रही है।