सबरीमाला मामले में केंद्र ने परंपरा का किया समर्थन
9 जजों की संविधान पीठ कर रही 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और समान अधिकारों को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत में बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ इस संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई कर रही है, जहां एक ओर केंद्र सरकार धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की बात कर रही है, वहीं अदालत लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों के संतुलन पर सवाल उठा रही है।
नई दिल्ली (ए)। धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जारी बहस एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के केंद्र में है। बुधवार को दूसरे दिन भी इस मामले की सुनवाई जारी रही, जिसमें 9 जजों की संविधान पीठ विभिन्न याचिकाओं पर विस्तृत चर्चा कर रही है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े 2018 के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह निर्णय धार्मिक परंपराओं की सही व्याख्या के बिना लिया गया था। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि मंदिर में कुछ आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को ‘भेदभाव’ या ‘अस्पृश्यता’ नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं का सम्मान किया जाता है और विभिन्न धर्मों में आस्था के अनुसार अलग-अलग परंपराएं होती हैं, जिनका पालन आवश्यक है। जैसे अन्य धार्मिक स्थलों पर सिर ढंकने जैसी परंपराएं हैं, उसी प्रकार सबरीमाला की भी विशिष्ट धार्मिक मान्यताएं हैं, जिनका सम्मान किया जाना चाहिए।
हालांकि, पीठ की एकमात्र महिला न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी महिला को उसके मासिक धर्म के आधार पर मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो यह किस हद तक समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान में छुआछूत को पूरी तरह समाप्त किया गया है और किसी भी प्रकार के भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह मामला बीते करीब 26 वर्षों से न्यायालयों में विचाराधीन है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटाने का फैसला सुनाया था। इसके बाद इस निर्णय के खिलाफ 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं।
वर्तमान में 9 जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक इन सभी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान पक्ष और विपक्ष दोनों को अलग-अलग तारीखों में अपने तर्क रखने का अवसर दिया जा रहा है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़े कई अहम संवैधानिक प्रश्न भी तय किए हैं। इनमें अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे, ‘संवैधानिक नैतिकता’ की परिभाषा, न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा और धार्मिक प्रथाओं को चुनौती देने के अधिकार जैसे मुद्दे शामिल हैं।
अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि धार्मिक आस्था और सामाजिक समानता के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है और किसी भी प्रकार के भेदभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता। आने वाले दिनों में इस मामले की सुनवाई देश में धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकती है।