ट्रायल कोर्ट का डिस्चार्ज आदेश निरस्त, पोक्सो और आईटी एक्ट के तहत आरोप तय करने के निर्देश
ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) से जुड़े गंभीर मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को दी गई राहत को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोप तय किए जाने चाहिए और मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी।
नई दिल्ली (ए)। ऑनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें दो आरोपियों—रमन कुमार और संदीप सिंह उर्फ लवली—को आरोपमुक्त कर दिया गया था।
हाई कोर्ट ने 4 अप्रैल 2026 को जारी अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध साक्ष्य आरोप तय करने के लिए पर्याप्त हैं और निचली अदालत को दोनों आरोपियों के खिलाफ विधि अनुसार चार्ज फ्रेम करने चाहिए।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा सोमवार को जारी प्रेस नोट के अनुसार, यह मामला ऑनलाइन माध्यमों से बच्चों से संबंधित अश्लील और शोषणकारी सामग्री (सीएसएएम) के प्रसार से जुड़ा है। जांच में सामने आया कि आरोपी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए वीडियो, तस्वीरें, लिंक और टेक्स्ट सामग्री साझा कर रहे थे, साथ ही ऐसे आपत्तिजनक कंटेंट को होस्ट भी कर रहे थे। सीबीआई ने अपनी जांच पूरी कर आरोपियों के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की विभिन्न धाराओं और पोक्सो एक्ट की धारा 15(2) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आरोपियों को पोक्सो एक्ट की उक्त धारा से राहत दे दी थी कि वीडियो में दिख रहे बच्चों की पहचान स्पष्ट नहीं है और उनकी उम्र निर्धारित करने के लिए आवश्यक कानूनी मानदंड पूरे नहीं किए गए हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि इस स्तर पर साक्ष्यों का गहन परीक्षण आवश्यक नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि क्या आरोप तय करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। अदालत के इस फैसले के बाद अब निचली अदालत में दोनों आरोपियों के खिलाफ पोक्सो एक्ट सहित अन्य धाराओं के तहत मुकदमा चलेगा, जिससे मामले में सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।