कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल और भूटान तक से लोग दर्शन के लिए आ रहे; मुख्य द्वार पर बंधे हजारों ताले और घड़ियां बनी पहचान, आश्रम से जुड़ी मान्यताओं को लेकर बढ़ी चर्चा
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से धमतरी मार्ग पर स्थित मातंगी धाम इन दिनों देश-विदेश के श्रद्धालुओं के बीच तेजी से पहचान बना रहा है। आश्रम प्रबंधन के अनुसार यहां केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों के साथ कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल और भूटान जैसे देशों से भी श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अनुष्ठान के लिए पहुंच रहे हैं। धाम की सबसे अलग पहचान मुख्य प्रवेश द्वार पर बंधे हजारों ताले, जंजीरें और घड़ियां हैं, जिन्हें श्रद्धालु अपनी मनोकामना और आस्था का प्रतीक मानते हैं।
करीब पांच वर्ष पहले स्थापित इस धाम में हर दिन बड़ी संख्या में लोग विभिन्न समस्याओं, बीमारियों, पारिवारिक तनाव और मानसिक शांति की कामना लेकर पहुंचते हैं। आश्रम परिसर में हवन, पूजन और अनुष्ठान का क्रम लगातार चलता रहता है।
कौन हैं मां मातंगी
आश्रम के संत प्रेमासाईं महाराज के अनुसार मां मातंगी को दस महाविद्याओं में नौवीं महाविद्या माना जाता है। उन्हें वाणी, संगीत, कला और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। गुजरात के महेसाणा जिले के मोढेरा में मां मातंगी का प्राचीन मंदिर स्थित है। आश्रम प्रबंधन का कहना है कि उनकी संस्था का पहला मातंगी धाम ओडिशा में स्थापित हुआ था, जबकि दूसरा धाम छत्तीसगढ़ में बनाया गया। प्रबंधन यह भी बताता है कि मां मातंगी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुलदेवी माना जाता है।
ताले और घड़ियों की अनोखी परंपरा
मातंगी धाम की सबसे चर्चित परंपरा मुख्य द्वार पर ताले और जंजीर बांधने की है। प्रेमासाईं महाराज के अनुसार श्रद्धालु 31 बार मंत्र जाप करने के बाद अपनी मनोकामना या परेशानी को प्रतीकात्मक रूप से ताले में बांध देते हैं और उसकी एक चाबी अपने पास रखते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इससे उनकी बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक परिवर्तन आता है। प्रवेश द्वार पर बंधी बड़ी संख्या में घड़ियां भी यहां आने वालों के बीच जिज्ञासा का विषय बनी रहती हैं।
स्वास्थ्य और मानसिक राहत से जुड़े दावे
आश्रम प्रबंधन का दावा है कि यहां आने वाले कई श्रद्धालु पूजा-अनुष्ठान के बाद स्वास्थ्य, मानसिक शांति और पारिवारिक परिस्थितियों में सुधार का अनुभव बताते हैं। दैनिक भास्कर से बातचीत में बिहार की मौसमी कुमारी ने कहा कि इलाज के साथ आश्रम आने के बाद उनकी सेहत में धीरे-धीरे सुधार हुआ। नेपाल से आए सुरेंद्र लिंबू ने पेट संबंधी समस्या में राहत मिलने की बात कही, जबकि बनारस की छिप्रा सिंह ने हवन-पूजन के बाद मानसिक संतोष मिलने का अनुभव साझा किया। महाराष्ट्र और राजस्थान से पहुंचे श्रद्धालुओं ने भी आश्रम के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त की।
आस्था का केंद्र बना धाम
धमतरी रोड स्थित यह धाम अब धार्मिक पर्यटन और आध्यात्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन, हवन और अनुष्ठान के लिए पहुंचते हैं। आश्रम प्रबंधन का कहना है कि लोगों का विश्वास और अनुभव ही इस धाम की सबसे बड़ी पहचान है, जबकि श्रद्धालु इसे अपनी मनोकामनाओं और मानसिक शांति से जोड़कर देखते हैं।