राजा विक्रमादित्य की आराधना, गोंड समुदाय की आस्था और पंडित प्रदीप मिश्रा की व्याख्या में मिलते हैं देवी के नाम और मंदिर की उत्पत्ति के अलग-अलग प्रसंग
रायपुर। डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर विराजित मां बम्लेश्वरी का मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख आस्था केंद्रों में से एक है। नवरात्रि के दौरान यहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगता है। देवी के प्रति अटूट विश्वास के साथ मंदिर के नाम, मूल स्वरूप और स्थापना को लेकर कई लोककथाएं भी प्रचलित हैं। कहीं राजा विक्रमादित्य, माधवानल और कामकंदला की प्रेमगाथा के जरिए देवी के प्राकट्य का वर्णन मिलता है, तो कहीं गोंड समुदाय की बमलाई और समलाई से जुड़ी मान्यताएं सामने आती हैं। खैरागढ़ राजपरिवार से जुड़ा एक विवरण मंदिर की प्राचीन प्रतिमा और गुफा का उल्लेख करता है। वहीं, कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने भगवान शिव के डमरू से निकले ‘बम’ नाद और माता पार्वती की परीक्षाओं के संदर्भ में मां के नाम की व्याख्या की है। इन कथाओं के जरिए डोंगरगढ़ के इस प्रसिद्ध शक्तिपीठ से जुड़ी विविध धार्मिक मान्यताओं को समझा जा सकता है।
माधवानल-कामकंदला की प्रेमगाथा से जुड़ा देवी का प्रसंग
डोंगरगढ़ के मां बम्लेश्वरी मंदिर से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा माधवानल और कामकंदला की प्रेमकहानी के इर्द-गिर्द घूमती है। इस कथा में कामाख्या नगरी, राजा कामसेन और उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का भी उल्लेख मिलता है।
लोककथा के अनुसार, राजा वीरसेन के बाद मदनसेन ने शासन संभाला और फिर उनके पुत्र कामसेन राजा बने। कामाख्या नगरी नृत्य-संगीत के लिए प्रसिद्ध थी। वहां कामकंदला नाम की राजनर्तकी रहती थी, जबकि माधवानल संगीत का विद्वान था। दोनों के बीच प्रेम संबंध स्थापित हो गया।
कथा में आगे बताया जाता है कि राजा कामसेन का पुत्र मदनादित्य भी कामकंदला को पसंद करता था। माधवानल और कामकंदला के प्रेम की जानकारी सामने आने के बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया। माधवानल डोंगरगढ़ की पहाड़ियों में जाकर छिप गया। इसके बाद उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने उसकी सहायता के लिए कामाख्या नगरी पर चढ़ाई की।
कहानी के एक प्रचलित रूप में युद्ध के दौरान कामकंदला को माधवानल की मृत्यु का समाचार मिलता है। यह खबर सुनकर वह पहाड़ी के नीचे स्थित तालाब में कूद जाती है। कामकंदला की मृत्यु का पता चलने पर माधवानल भी अपने प्राण त्याग देता है।
इसके बाद राजा विक्रमादित्य देवी की आराधना करते हैं। कथा के कुछ रूपों में देवी के प्रकट होने और प्रेमी युगल को दोबारा जीवन प्रदान करने का प्रसंग आता है। इसी लोकमान्यता के अनुसार, विक्रमादित्य देवी से डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर विराजमान होने का आग्रह करते हैं। देवी उनकी प्रार्थना स्वीकार करती हैं। इस प्रसंग को मंदिर की स्थापना और पहाड़ी पर मां के विराजने की मान्यता से जोड़कर देखा जाता है।
हालांकि, यह कथा लोकपरंपरा में प्रचलित धार्मिक आख्यान है। इसे मंदिर की स्थापना का प्रमाणित ऐतिहासिक विवरण मानने के बजाय इससे जुड़ी आस्था और जनश्रुति के रूप में देखना उचित है।