छत्तीसगढ़ में लंबे समय से लंबित 76% आरक्षण बिल समेत 9 विधेयकों पर जल्द निर्णय की मांग तेज, कांग्रेस ने राज्यपाल और बीजेपी पर साधा निशाना
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद छत्तीसगढ़ में विधायिका और राज्यपाल के अधिकारों को लेकर फिर से बहस तेज हो गई है। विशेष रूप से 76% आरक्षण से जुड़ा विधेयक जो दो वर्षों से राजभवन में लंबित है, उसे लेकर कांग्रेस ने अब राज्यपाल से शीघ्र निर्णय की मांग की है। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने इसे बीजेपी की साजिश करार देते हुए कहा – “अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
छत्तीसगढ़ में आरक्षण बढ़ाने संबंधी संशोधन विधेयक दो साल से राजभवन की फाइलों में बंद है, और अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के बाद इस पर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस ने मांग की है कि राज्यपाल अब और देर न करें और विधेयकों पर संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार शीघ्र हस्ताक्षर करें। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने स्पष्ट आरोप लगाया कि भाजपा की रणनीति और दुर्भावना के चलते ही एसटी, एससी, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस वर्गों को मिलने वाला आरक्षण अटका पड़ा है। उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे सर्वसमाज के अधिकारों से जुड़ा हुआ है।

साल 2022 में पारित इस विधेयक में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण को 20% से बढ़ाकर 32%, अनुसूचित जाति को 13%, ओबीसी को 27% और ईडब्ल्यूएस को 4% निर्धारित किया गया था। लेकिन यह विधेयक आज भी मंजूरी का इंतजार कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि राज्यपाल किसी भी विधेयक को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते। उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल के पास ‘वीटो’ का कोई अधिकार नहीं है, वे केवल दो ही विकल्प अपना सकते हैं – या तो विधेयक को मंजूरी दें, या उसे पुनर्विचार के लिए विधानसभा को लौटाएं। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और भाजपा से सवाल पूछा है कि वे राज्यपाल से इस मुद्दे पर कब मिलेंगे? साथ ही कांग्रेस ने भाजपा से इस पर स्पष्ट रुख बताने की भी मांग की है।
वर्तमान में राज्य में कुल 9 विधेयक ऐसे हैं जो या तो राजभवन या राष्ट्रपति भवन में अटके हुए हैं। इनमें से कुछ बिलों को लेकर पहले भी सियासी बयानबाज़ी हो चुकी है, जैसे:
- धर्म स्वातंत्र्य विधेयक (अजीत जोगी काल से लंबित)
- रामविचार नेताम का विधेयक (रमन सिंह सरकार के समय)
- भूपेश बघेल सरकार द्वारा बनाए गए कृषि कानूनों के जवाबी विधेयक
कुलाधिपति संशोधन विधेयक, जिसमें यूनिवर्सिटी में कुलपति की नियुक्ति से राज्यपाल के अधिकार सीमित करने की बात थी। इन सभी में सबसे महत्वपूर्ण है आरक्षण संशोधन विधेयक, जो पूर्व राज्यपाल अनुसुइया उइके के कार्यकाल से ही अटका पड़ा है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट दिशा-निर्देश दे दिए हैं, तो कांग्रेस को उम्मीद है कि राजभवन जल्द फैसला लेगा। यदि विधेयक लौटाया जाता है तो सरकार उसे आवश्यक संशोधनों के साथ पुनः पारित कर सकती है, लेकिन अब यह फाइलों में दबा नहीं रह सकता।