- प्रमोशन नीति को न्यायालय ने बताया उचित
- बीएड अनिवार्यता और वरिष्ठता को लेकर दायर याचिकाएं खारिज
- कोर्ट ने पहले जारी स्थगन आदेश को वापस लिया
- 3500 से अधिक स्कूलों में नियुक्ति का रास्ता साफ
छत्तीसगढ़ में प्राचार्य पद पर लंबित प्रमोशन प्रक्रिया को अब न्यायिक स्वीकृति मिल गई है। उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की पदोन्नति नीति को वैध मानते हुए स्थगन आदेश हटा दिया है। इससे जुड़ी सभी याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं, जिससे अब स्कूल शिक्षा विभाग को नियुक्ति आदेश जारी करने का रास्ता साफ हो गया है।
रायपुर। छत्तीसगढ़ में प्राचार्यों की नियुक्ति से जुड़ी अड़चन अब समाप्त हो गई है। उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की प्रमोशन नीति को विधिसम्मत करार देते हुए, पदोन्नति के खिलाफ दायर तमाम याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इसके साथ ही पहले से जारी रोक को भी समाप्त कर दिया गया है।
राज्य सरकार ने 30 अप्रैल को प्राचार्य पदोन्नति की सूची जारी की थी, जिसके विरुद्ध कई याचिकाएं दायर की गई थीं। इनमें बीएड डिग्री की अनिवार्यता, वरिष्ठता विवाद और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर आपत्ति जताई गई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पूर्व के आदेशों के बावजूद कुछ शिक्षकों को प्रमोशन देकर ज्वॉइनिंग दे दी गई थी, जो अवमानना के दायरे में आता है। इस पर अदालत ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी करते हुए तत्काल प्रभाव से सभी नियुक्तियों पर रोक लगा दी थी।
हालांकि अब सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकार की प्रमोशन नीति में कोई असंवैधानिकता या भेदभाव नहीं है। डिवीजन बेंच की यह सुनवाई 11 से 16 जून के बीच लगातार चली थी, जिसमें राज्य की ओर से दलील दी गई कि सभी शिक्षक वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए नियम बनाए गए हैं।
3500 स्कूलों को मिल सकती है स्थायी नेतृत्व व्यवस्था
शिक्षक प्रतिनिधियों ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद न्याय मिला है। उनका कहना है कि राज्य सरकार को अब बिना विलंब किए प्राचार्यों की नियुक्ति आदेश जारी करने चाहिए, ताकि शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से पहले 3500 से अधिक स्कूलों को नेतृत्व मिल सके।