1981 में लोकायुक्त ने ट्रैप कर पकड़ा था, ट्रायल कोर्ट ने दी थी 1 साल की सजा; साक्ष्यों के अभाव में हाईकोर्ट ने सुनाया बरी होने का फैसला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 39 साल पुराने रिश्वत मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मध्यप्रदेश स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (MPSRTC) रायपुर के बिल सहायक रहे रामेश्वर प्रसाद अवधिया को 100 रुपए की रिश्वत लेने के आरोप से बरी कर दिया गया है। हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी या रकम स्वीकार की थी।
रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 39 साल पुराने भ्रष्टाचार के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। रायपुर स्थित मध्यप्रदेश स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (MPSRTC) के बिल असिस्टेंट रामेश्वर प्रसाद अवधिया को 100 रुपए रिश्वत लेने के आरोप से बरी कर दिया गया।
दरअसल, 1981 से 1985 तक बकाया बिल पास कराने के लिए कर्मचारी अशोक कुमार वर्मा ने अवधिया पर 100 रुपए रिश्वत मांगने का आरोप लगाया था। शिकायत लोकायुक्त तक पहुंची और ट्रैप कार्रवाई के दौरान 50-50 रुपए के नोटों के साथ अवधिया को पकड़ लिया गया। इसके बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज हुआ।
ट्रायल कोर्ट ने 2004 में अवधिया को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 7 और 13(1)(डी) सहपठित 13(2) के तहत एक साल की सजा और 1000 रुपए जुर्माना लगाया था। इस फैसले को अवधिया ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
जस्टिस बी.डी. गुरु की बेंच ने सुनवाई में पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने वास्तव में रिश्वत मांगी या स्वीकार की। मौखिक, दस्तावेजी और परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1947 और 1988 के प्रावधानों में अंतर है, और पर्याप्त साक्ष्य न होने की स्थिति में दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए अवधिया को बरी कर दिया।