- सोशल मीडिया की अफवाहों से बढ़ी ‘पैनिक बुकिंग’, मांग में 40% तक उछाल
- मध्य-पूर्व तनाव और लॉजिस्टिक बाधाओं ने बढ़ाया वितरण पर दबाव
- सरकार के त्वरित कदम—उत्पादन बढ़ा, जमाखोरी पर कार्रवाई और बुकिंग नियम सख्त
- ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम: आयात विविधीकरण और PNG नेटवर्क विस्तार
मार्च 2026 के दूसरे सप्ताह में देशभर में एलपीजी सिलिंडर की कमी की खबरों ने अचानक चर्चा का रूप ले लिया। कई शहरों में बुकिंग बढ़ने, डिलीवरी में देरी और गैस एजेंसियों पर दबाव की शिकायतें सामने आईं। हालांकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में गैस की वास्तविक कमी नहीं थी, बल्कि सोशल मीडिया से फैली आशंकाओं के कारण अचानक बढ़ी मांग और पैनिक बुकिंग ने वितरण व्यवस्था पर अस्थायी दबाव बना दिया।

कैलाश चन्द्र
मार्च 2026 के दूसरे सप्ताह में देश के विभिन्न हिस्सों से एलपीजी सिलिंडर की उपलब्धता को लेकर उठी चिंताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का रूप ले लिया। कई उपभोक्ताओं ने गैस बुकिंग में देरी और सिलिंडर की आपूर्ति प्रभावित होने की शिकायतें सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से साझा कीं। इससे आम लोगों के बीच आशंका का माहौल बन गया।
हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों ने स्पष्ट किया कि देश में एलपीजी की कोई वास्तविक कमी नहीं है। अधिकारियों के अनुसार कुछ क्षेत्रों में अचानक बढ़ी मांग और वितरण व्यवस्था पर अस्थायी दबाव के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई।
आंकड़ों के अनुसार मार्च के शुरुआती दिनों में रोजाना एलपीजी बुकिंग का औसत लगभग 5.5 मिलियन से बढ़कर 7.6 मिलियन तक पहुंच गया। यह लगभग 35 से 40 प्रतिशत की वृद्धि थी। विशेषज्ञों ने इसे ‘पैनिक बुकिंग’ का परिणाम बताया। कई शहरों में उपभोक्ताओं ने आशंका के कारण एक से अधिक सिलिंडर बुक करना शुरू कर दिया, जिससे सप्लाई चक्र पर अचानक दबाव बढ़ गया।

स्थिति के पीछे वैश्विक परिस्थितियां भी एक महत्वपूर्ण कारण रहीं। मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ गया। इसका असर ऊर्जा आपूर्ति की वैश्विक श्रृंखला पर पड़ा और कुछ शिपमेंट में देरी देखने को मिली।
भारत अपनी कुल एलपीजी आवश्यकता का लगभग 60 से 65 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय परिवहन में थोड़ी भी बाधा घरेलू वितरण प्रणाली को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में ट्रांसपोर्ट की कमी, सड़क मरम्मत और मौसम से जुड़ी स्थानीय समस्याओं ने भी सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ाया।
स्थिति को संभालने के लिए सरकार और तेल विपणन कंपनियों ने त्वरित कदम उठाए। रिफाइनरियों को निर्देश दिया गया कि वे प्रोपेन-ब्यूटेन स्ट्रीम को अधिक मात्रा में एलपीजी उत्पादन में परिवर्तित करें। इस निर्णय से घरेलू उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत तक वृद्धि हुई।
इसके साथ ही आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग पर सख्त कार्रवाई शुरू की गई। पैनिक बुकिंग को नियंत्रित करने के लिए बुकिंग गैप बढ़ाया गया, ताकि वितरण प्रणाली पर अनावश्यक दबाव कम हो सके।
सरकार ने यह भी सुझाव दिया कि जहां पाइप्ड नैचुरल गैस (PNG) की सुविधा उपलब्ध है, वहां उपभोक्ता अस्थायी रूप से उसका उपयोग बढ़ाएं। साथ ही अफवाहों को रोकने के लिए लगातार प्रेस विज्ञप्तियों और जनजागरूकता अभियान के माध्यम से लोगों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया गया।
इस पूरे घटनाक्रम का असर विभिन्न वर्गों पर अलग-अलग रहा। घरेलू उपभोक्ताओं को सामान्यतः दो से तीन दिनों के भीतर सिलिंडर की आपूर्ति मिलती रही, हालांकि कुछ स्थानों पर हल्की देरी देखने को मिली। वहीं होटल, रेस्टोरेंट और अन्य वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
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इस बीच कई मिथक भी फैलने लगे, जिनमें सबसे प्रमुख यह था कि देश में गैस खत्म हो गई है। विशेषज्ञों और सरकारी आंकड़ों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज किया। वास्तविकता यह रही कि देश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद था और वितरण व्यवस्था सीमित देरी के साथ लगातार काम करती रही।
दीर्घकालिक दृष्टि से यह स्थिति भारत की ऊर्जा नीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। सरकार अब एलपीजी आयात के स्रोतों को विविध बनाने, घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने और पाइप्ड गैस नेटवर्क के विस्तार पर तेजी से काम कर रही है। अमेरिका जैसे देशों के साथ दीर्घकालिक आयात समझौते भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, PNG नेटवर्क का विस्तार और वैकल्पिक कुकिंग तकनीकों को बढ़ावा देने से भविष्य में ऐसे अस्थायी संकटों की संभावना काफी कम हो जाएगी।
कुल मिलाकर मार्च 2026 में उठी एलपीजी संकट की चर्चा स्थायी कमी का संकेत नहीं थी, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों, लॉजिस्टिक चुनौतियों और पैनिक बुकिंग से उत्पन्न अस्थायी दबाव का परिणाम थी। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखाया कि भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रणाली चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखने की क्षमता रखती है।