खाने का तेल 7% तक महंगा, आयात पर निर्भरता बनी वजह
एफएमसीजी कंपनियां घटा रहीं पैकेट का आकार, ‘श्रिंकफ्लेशन’ बढ़ा
वॉशिंग मशीन, फ्रिज और LED टीवी के दाम 15% तक बढ़ने की आशंका
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारतीय बाजार और आम लोगों की जेब पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने घरेलू बजट को झटका दिया है, जिससे रसोई से लेकर रोजमर्रा के सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स तक महंगाई का दबाव बढ़ गया है।
मुंबई (ए)। ईरान समेत पश्चिम एशिया क्षेत्र में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर भारत में महंगाई के रूप में सामने आने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने कई सेक्टरों पर एक साथ दबाव बनाया है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं के खर्च पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में यह असर और गहरा सकता है। ईवाई इंडिया के विश्लेषण में बताया गया है कि महंगाई का यह दबाव अगले दो वर्षों तक बना रह सकता है। सबसे ज्यादा असर खाद्य तेलों पर देखने को मिल रहा है, जिनकी कीमतों में 7 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है। भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 57 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है, जिसमें पाम ऑयल, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल प्रमुख हैं।
दूसरी ओर, बढ़ती लागत का असर एफएमसीजी सेक्टर पर भी साफ दिखाई दे रहा है। पैकेजिंग, परिवहन और कच्चे माल की लागत बढ़ने से कंपनियां या तो उत्पादों के दाम बढ़ा रही हैं या फिर पैकेट का आकार छोटा कर रही हैं। इस प्रवृत्ति को ‘श्रिंकफ्लेशन’ कहा जाता है, जिसमें उपभोक्ताओं को कम मात्रा में उत्पाद मिलते हैं, जबकि कीमत लगभग वही रहती है।
सिर्फ रोजमर्रा के सामान ही नहीं, बल्कि उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं के दाम भी बढ़ने लगे हैं। वॉशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर और एलईडी टीवी जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की कीमतों में 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा पेंट, टेक्सटाइल और पर्सनल केयर उत्पाद बनाने वाली कंपनियां भी लागत बढ़ने का हवाला देते हुए कीमतों में बढ़ोतरी की तैयारी कर रही हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में जल्द राहत नहीं मिली, तो इसका असर लंबे समय तक आम लोगों की जेब पर पड़ता रहेगा और महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।