SECL ने जमीन अधिग्रहण के बदले दूसरे व्यक्ति को दी थी नौकरी, हाईकोर्ट ने 2017 का आदेश निरस्त कर कहा— ‘हकदार को मिलना चाहिए न्याय’
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में 30 साल पुराने भूमि अधिग्रहण मामले में पीड़ित महिला को न्याय दिलाया है। कोर्ट ने SECL द्वारा की गई फर्जी नियुक्ति को रद्द करते हुए महिला के बेटे को नौकरी देने का निर्देश दिया है, साथ ही स्पष्ट किया कि सरकारी उपक्रमों को निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांतों के तहत कार्य करना चाहिए।
कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले की निर्मला तिवारी को आखिरकार तीन दशक बाद न्याय मिला है। वर्ष 1981 में दीपका गांव स्थित उनकी 0.21 एकड़ जमीन कोयला खदान के लिए अधिग्रहित की गई थी। बदले में SECL को पुनर्वास नीति के तहत उनके परिवार को मुआवजा और एक सदस्य को नौकरी देनी थी।
मुआवजा तो 1985 में दे दिया गया, लेकिन नौकरी किसी और को दे दी गई। एक फर्जी व्यक्ति नंद किशोर जायसवाल ने खुद को निर्मला तिवारी का बेटा बताकर नौकरी हासिल कर ली। जब इस धोखाधड़ी की जानकारी महिला ने SECL प्रबंधन को दी, तब वर्षों की लड़ाई के बाद 2016 में नंद किशोर को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।
इसके बावजूद निर्मला के असली बेटे उमेश तिवारी को नौकरी नहीं दी गई। SECL ने तर्क दिया कि जमीन अधिग्रहण के समय न तो महिला के नाम म्यूटेशन था और न ही बेटा पैदा हुआ था।
इस पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने SECL के 6 जुलाई 2017 के आदेश को निरस्त करते हुए साफ कहा कि म्यूटेशन केवल कब्जे का प्रमाण है, स्वामित्व का नहीं। जब मुआवजा दिया गया था, तो स्वामित्व स्वीकार किया गया था। साथ ही कोर्ट ने कहा कि सिर्फ जन्म की तारीख के आधार पर किसी का हक नहीं छीना जा सकता।
जस्टिस संजय के अग्रवाल ने फैसले में स्पष्ट किया कि SECL ने अपने वादे का उल्लंघन कर गलत व्यक्ति को नौकरी देकर याचिकाकर्ता के साथ अन्याय किया। कोर्ट ने यह आदेश दिया कि उमेश तिवारी को 6 जुलाई 2017 से नौकरी दी जाए और सभी लाभ भी उस तारीख से दिए जाएं।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने मामले (मोहन महतो बनाम सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड) का हवाला देते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत ‘राज्य’ का दर्जा प्राप्त है, जिससे उनसे निष्पक्षता और सद्भावना की अपेक्षा की जाती है।