शशि थरूर ने कहा— देश के भविष्य के लिए राजनीतिक दलों को मिलकर काम करना चाहिए, इमरजेंसी से सीखना वक्त की ज़रूरत है, न कि उसे केवल अतीत की गलती मानना।
कांग्रेस नेता और सांसद शशि थरूर ने कोच्चि में आयोजित एक कार्यक्रम में स्पष्ट कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि की पहली निष्ठा राष्ट्र के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी पार्टी के प्रति। उन्होंने राजनीतिक सहयोग को गद्दारी बताने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया और देशहित में एकजुट प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया। थरूर ने इमरजेंसी के दौरान हुई घटनाओं को याद करते हुए लोकतंत्र की रक्षा के लिए सतर्कता की चेतावनी दी।
नई दिल्ली (ए)। कोच्चि में शनिवार को ‘शांति, सद्भाव और राष्ट्रीय विकास’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि भारत के नेताओं की पहली वफादारी देश के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी पार्टी के प्रति। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल सिर्फ माध्यम होते हैं, मकसद देश को बेहतर बनाना होना चाहिए।
थरूर ने जोर देते हुए कहा कि जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा या लोकतांत्रिक मूल्यों की हो, तो सभी दलों को मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि दुर्भाग्य से जब कोई नेता ऐसा करने की कोशिश करता है, तो उसे गद्दार करार दे दिया जाता है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
थरूर ने हाल ही में मलयालम अख़बार ‘दीपिका’ में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने 1975 की इमरजेंसी को सिर्फ एक काला अध्याय नहीं, बल्कि एक चेतावनी बताया। उन्होंने इंदिरा गांधी सरकार के नसबंदी अभियान को “मनमाना और अमानवीय” बताते हुए कहा कि लोकतंत्र को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए।
उन्होंने लिखा कि सत्ता के केंद्रीकरण, विरोध की आवाज़ों को दबाने और संविधान को नजरअंदाज करने की प्रवृत्तियाँ फिर सिर उठा सकती हैं। इसलिए लोकतंत्र की रक्षा करने वालों को हमेशा सजग रहना चाहिए।
थरूर का एक और लेख 23 जून को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक मंच पर सक्रियता और नेतृत्व की सराहना की थी। इस लेख को कांग्रेस पार्टी के रुख से भिन्न मानते हुए राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई। हालांकि कांग्रेस ने थरूर के विचारों को उनकी ‘व्यक्तिगत राय’ बताया और पार्टी लाइन से अलग करार दिया।