कोर्ट बोला—यदि कथित क्रूरता माफ कर दी जाए तो तलाक का आधार नहीं बनता; पत्नी ने आरोपों से इनकार करते हुए साथ रहने की इच्छा जताई
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि सबूतों के बिना क्रूरता सिद्ध नहीं हो सकती और यदि पूर्व में हुए किसी विवाद को पति ने माफ कर दिया है, तो वह तलाक का आधार नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का निर्णय बरकरार रखते हुए पति की अपील को खारिज कर दिया।
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच तनाव और तलाक को लेकर चले विवाद में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि बिना ठोस सबूतों के क्रूरता साबित नहीं होती। साथ ही यदि कथित क्रूरता के बाद भी दंपती साथ रहते हैं, तो यह माना जाएगा कि घटना माफ कर दी गई है। ऐसे में तलाक का आधार शेष नहीं रह जाता।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की खंडपीठ ने जांजगीर निवासी युवक की अपील को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। युवक ने अपनी पत्नी पर मानसिक क्रूरता, धमकी और अलगाव के आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी।
युवक ने कोर्ट को बताया कि पत्नी के पास तीन मोबाइल सिम मिले थे और वह अनजान नंबरों से गाली-गलौज और अश्लील वीडियो वायरल करने की धमकी देती थी। उसका आरोप था कि पत्नी 29 मार्च 2023 को घर छोड़कर चली गई।
फैमिली कोर्ट ने अगस्त 2024 में सबूतों के अभाव में तलाक याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ युवक ने हाईकोर्ट में अपील की।
दूसरी ओर पत्नी ने सभी आरोपों को नकारते हुए कहा कि विवाद पति और उसके भाई के बीच चल रही घरेलू तनातनी से उपजा था। उसने कहा कि वह अब भी पति के साथ रहने को तैयार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि नवंबर 2022 से 29 मार्च 2023 तक दोनों साथ रहे, इससे स्पष्ट है कि यदि कोई घटना हुई भी थी तो पति ने उसे माफ कर दिया। हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 23(1)(b) के तहत माफ की गई क्रूरता तलाक का आधार नहीं बन सकती।
कानूनी प्रावधान और परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने पति की अपील को पूर्णतः निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।