रायपुर के सिनेमा हॉल में महिला की आत्महत्या का मामला; हाईकोर्ट ने कहा- साक्ष्यों से साबित हुआ आरोपी के व्यवहार और आत्महत्या के बीच संबंध
करीब 13 साल पुराने महिला की आत्महत्या के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आरोपी की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने सुसाइड नोट, हस्तलेखन विशेषज्ञ की रिपोर्ट और मृतका की मां की गवाही को अहम मानते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने उसे चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है।
बिलासपुर। सुसाइड नोट में दर्ज प्रताड़ना और धमकियों के आरोपों को फॉरेंसिक जांच तथा परिजनों की गवाही से समर्थन मिलने के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने के दोषी की सजा बरकरार रखी है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने बाबली सिंह उर्फ बबलू उर्फ बोध सिंह की अपील खारिज करते हुए पांच साल की सश्रम कैद और दो हजार रुपए जुर्माने के फैसले को कायम रखा। आरोपी को चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करना होगा।
पर्स से मिले थे अहम साक्ष्य
मामला 24 मई 2013 का है। अभियोजन के मुताबिक, मंजू शर्मा ने रायपुर के 36 सिटी मॉल स्थित सिनेमा हॉल में सल्फास खा लिया था। अस्पताल में उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम में जहर के प्रभाव से हृदय और सांस संबंधी दिक्कतों को मौत की वजह बताया गया। एफएसएल की जांच में मृतका के विसरा में एल्युमिनियम फॉस्फाइड जहर पाया गया।
जांच के दौरान पुलिस ने मृतका के पर्स से सुसाइड नोट, सल्फास की पुड़िया, फोटो और पहचान पत्र जब्त किए। हस्तलेखन विशेषज्ञ की जांच में दस्तावेजों पर लिखावट एक ही व्यक्ति की होने की पुष्टि हुई। इन साक्ष्यों ने मामले की सुनवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मां की गवाही ने आरोपों को दिया आधार
मृतका की मां ने अदालत को बताया कि आत्महत्या से दो-तीन महीने पहले उनकी बेटी ने आरोपी द्वारा प्रताड़ित किए जाने की बात कही थी। बेटी ने अपने बेटे को अगवा करने की धमकी मिलने की जानकारी भी दी थी। मां के अनुसार, आरोपी ने एक बार दुकान में उनकी बेटी को कुर्सी से पीटा था।
आरोपी की ओर से बचाव में कहा गया कि मृतका का वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण था और वह पहले भी आत्महत्या का प्रयास कर चुकी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का आकलन करने के बाद बचाव पक्ष की दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
सिर्फ विवाद नहीं, लगातार प्रताड़ना का मामला
हाईकोर्ट ने माना कि सुसाइड नोट में दर्ज लगातार प्रताड़ना और धमकियों की बात को परिजनों की गवाही से भी समर्थन मिला। अदालत के अनुसार, उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपी के व्यवहार और महिला की आत्महत्या के बीच संबंध स्थापित होता है। इसलिए निचली अदालत का दोषसिद्धि संबंधी फैसला हस्तक्षेप योग्य नहीं है।
अदालत ने साथ ही स्पष्ट किया कि केवल कहासुनी या सामान्य विवाद अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित नहीं करता। मामले में आरोपी की मंशा, आचरण और आत्महत्या के बीच संबंध को साक्ष्यों के आधार पर परखना जरूरी है। इस प्रकरण में अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषसिद्धि को सही पाया।
समयसीमा में आत्मसमर्पण का आदेश
हाईकोर्ट ने पांच साल की सश्रम कैद और दो हजार रुपए जुर्माने की सजा में कोई बदलाव नहीं किया। आरोपी को चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर शेष कानूनी प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया है। तय समय में सरेंडर नहीं करने पर संबंधित अदालत उसे हिरासत में लेकर सजा भुगतने की कार्रवाई करेगी।