एक्सपर्ट की सलाह: पढ़ने को सजा नहीं, आनंददायक अनुभव बनाइए; परिवार का माहौल और बच्चे की रुचि सबसे अहम
नई दिल्ली (ए)। 12 वर्षीय बेटे के किताबों से दूरी बनाने और हर खाली समय में मोबाइल, लैपटॉप या टीवी स्क्रीन पर व्यस्त रहने की समस्या आज अनेक अभिभावकों के सामने है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे बच्चों में पढ़ने की आदत जबरदस्ती नहीं डाली जा सकती, बल्कि घर के माहौल, सही किताबों के चयन और नियमित ‘रीडिंग टाइम’ के जरिए धीरे-धीरे विकसित की जाती है।
फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर डॉ. अमिता श्रृंगी के अनुसार, आज की डिजिटल जीवनशैली बच्चों के अटेंशन स्पैन को प्रभावित कर रही है। स्क्रीन पर लगातार बदलने वाला कंटेंट मस्तिष्क को तुरंत उत्तेजित करता है, जबकि किताब पढ़ने के लिए धैर्य और एकाग्रता की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि कई बच्चे होमवर्क और सिलेबस पूरा कर लेते हैं, लेकिन कहानी, कॉमिक्स या ज्ञानवर्धक पुस्तकों में रुचि नहीं ले पाते।
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे को उसकी पसंद के विषय—जैसे विज्ञान, अंतरिक्ष, क्रिकेट, जानवरों की कहानियां, रहस्य-रोमांच या कॉमिक्स—से जुड़ी किताबें उपलब्ध करानी चाहिए। साथ ही पढ़ने को परिवार की साझा गतिविधि बनाया जाए, जहां माता-पिता भी प्रतिदिन 15-20 मिनट किताब, पत्रिका या अखबार पढ़ें।
डॉ. श्रृंगी सलाह देती हैं कि किताब को टीवी या मोबाइल का विकल्प बनाकर सजा की तरह प्रस्तुत न करें। यदि पढ़ते समय कहानी के पात्रों की आवाज, चित्रों पर चर्चा और आगे की कहानी का अनुमान लगाने जैसी गतिविधियां शामिल की जाएं, तो बच्चा पढ़ने को आनंददायक अनुभव के रूप में स्वीकार करने लगता है। उनके अनुसार, रीडिंग हैबिट किसी एक दिन में नहीं बनती, बल्कि छोटे-छोटे सकारात्मक अनुभवों से विकसित होती है। इसलिए धैर्य रखें, बच्चे की रुचि को महत्व दें और स्क्रीन समय के साथ-साथ किताबों के लिए भी रोजाना एक निश्चित समय निर्धारित करें।